दिल्ली सल्तनत: कला, शिक्षा और व्यापार

DoTheBest
By DoTheBest May 9, 2015 18:47

दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत कला, शिक्षा और व्यापार शैली में एक अद्भुत हिंदू और इस्लामी शैली का मिश्रण दृष्टिगोचर होता है.

दिल्ली सल्तनत के दौरान कला

1258 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत अत्यंत महत्वपूर्ण कला और संस्कृति का केंद्र हो चुका था. चूँकि मंगोलों ने मध्य और पश्चिमी एशिया के सांस्कृतिक केंद्रों को नष्ट कर दिया और उस इलाके के कलाकारों के लिए भारत के महत्वपूर्ण केंद्र साबित हुआ था. 1296-1316 ईस्वी के दौरान, खुसरो की कविता, बरनी का ऐतिहासिक कार्यशैली और हजरत निजाम-उद-दीन औलिया की तालिका में इस सांस्कृतिक जीवन शक्ति के सभी तत्व मौजूद रहे थे. इस अवधि में बगदाद और कॉर्डोबा में किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक खोजों या इससे सम्बंधित तथ्यों के ऊपर खोजबीन के कार्यो के बारे में पता नहीं चलता है. और शायद यही कारण था की मध्य एवं पश्चिमी एशिया के के कलाकारों और विद्वान समुदायों नें भारत की तरफ आने का निर्णय किया और भारत का रुख किया. उल्लेखनीय है की इस क्षेत्र से आने वाले सभी कलाकारों ने किसी भी प्रकार के कोई पुस्तकालयों को नहीं लाया था. नतीजतन, जो भी कविता, संगीत और लेखन के सन्दर्भ में कार्य किया गया वे सभी किसी अन्य ज्ञान के संग्रह पर निर्भर नहीं थे. यही कारण था की पुस्तकालयों की कमी के कारण, भारत में बड़े शिक्षण संस्थानों को विकसित नहीं किया गया.

भारत में मुस्लिम शासन के दौरान, धार्मिक अनुदान का प्रमुख, सद्र-ए-जहान,  होता था. इस अधिकारी का प्रमुख कार्य यह होता था की यह इस्लामी विषयों में शिक्षा प्रदान करने के लिए विभिन्न धार्मिक समूहों को कर मुक्त भूमि का अनुदान देता था. इस काल में दो बड़े शैक्षिक संस्थान(मदरसा) मुइजिया और नासीरिया की स्थापना उन्नत अध्ययन के लिए की गयी थी. इन संस्थानों में तीन मुख्य विषय तफ्शिर (कुरान की व्याख्या), हदीस (परंपरा), और फिकह (संविधान) पढाये जाते थे.

दक्कन में, विज्ञान विषयों ऊपर खासा ध्यान दिया जाता था. फ़िरोज़, एक बहमनी राजा था  इस तरह की शिक्षा प्रणाली जोकि वनस्पति विज्ञान, ज्यामिति, और खगोल विज्ञान के रूप में थी विषयों को प्रोत्साहित करता था. चिकित्सा विज्ञान पर भी इस काल में खासा ध्यान दिया गया था. 1329 ईस्वी में जिया मुहम्मद नें दवा के ऊपर एक पांडुलिपि (मजमुआ-ए-जीई) का लेखन कार्य किया था. इस पुस्तक में भारत और अरब की चिकित्सा प्रणाली के बारे में वर्णन किया गया है. चिकित्सा विज्ञानं पर इस पुस्तक के अलावा तिब्ब-ए-सिकंदरी जिसका लेखन कार्य मियां भुवा के द्वारा 1512ईस्वी में किया गया था. उल्लेखनीय हैं की यह पुस्तक आंतरिक चिकित्सा प्रणालियों के सन्दर्भ में एक मानक पाठ्यपुस्तक थी.

रेज़ा (इसे संग्रेज़ा के रूप में भी कहा गया है) इल्तुतमिश का सचिव था. यह पहला विद्वान था जिसका जन्म भारत में हुआ था. सल्तनत के प्रारंभिक इतिहास में आमिर खुशरो एक प्रख्यात फारसी कवि थे. उनका लेखन कार्य चल रही घटनाओं से संबंधित थीं. जैसे उनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थ हैं- किरान-उस-सादेन,मिफ्ता-उल-फुतूह,आशिका, और खजाइन-उल-फुतूह आदि प्रमुख ग्रन्थ.

भारतीय संगीत नें अरब संगीत पर इस कदर एक प्रभाव डाला था जिसकी वजह से उत्तरी भारत में एक नयी प्रकार की संगीत प्रणाली का जन्म हुआ था. सुल्तान हुसैन संगीत के रोमांटिक स्कूल के मूल संस्थापकथे.

दिल्ली सल्तनत के दौरान व्यापार

हिंदुओं नें स्वयं को विदेशी और घरेलु व्यापार में अपने आपको प्रमुख स्थान प्रदान किया था. फिर मुश्लिम व्यापारिक समुदाय विदेशी व्यापार में अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किये हुए था. वस्तुतः इनका अभी भी विदेशी व्यापार में एक बड़ा हिस्सा था. आमतौर पर ये लोग भारत में दुर्लभ वस्तुएं, घोड़े,खच्चर और अन्य महत्वपूर्ण सवारी के साधन पशुओ के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित किये हुए थे. मुस्लिम सवारों की सफलता को देखते हुए, हिंदुओं ने भी घोड़ों के व्यापार को हाथियों के व्यापार से प्रतिस्थापन करना शुरू कर दिया था.

निर्यात किये जाने वाले माल के अंतर्गत खाद्यान्न और कपड़ा आदि शामिल किये जाते थे. कृषि उत्पादों के अंतर्गत गेहूं, चावल, दाल, तिलहन,शक्कर, कपास आदि और अन्य वस्त्रों को शामिल किया जाता था. कपास आदि सामानों को दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी अफ्रीका, और यूरोप को निर्यात किया जाता था. अरब व्यापारी इन महत्वपूर्ण उत्पादों को लाल सागर के माध्यम से दमिश्क और सिकंदरिया को ले जाते थे. जहां से इन उत्पादों को वे भूमध्यसागरीय देशों को निर्यात करते थे  और अपनी व्यापारिक गतिविधियों को अंजाम देते थे.

इस काल में कुछ अन्य उद्योगों जैसे कपड़ा, धातु का काम, नील और कागज के उद्योंगो ने भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया था. मुश्लिम समुदाय रेशम के बेहतरीन किस्मों के लिए बंगाल पर निर्भर रहते थे. इसके अलावा धातु से जुड़े कई उद्योगों जैसे तलवारें, बंदूकें, और अन्य घरेलू वस्तुओं के निर्माण से सम्बंधित उद्योंग भी इस काल में फले-फूले. चीनी का विनिर्माण भी बड़े पैमाने पर बंगाल में किया जाता था और उसे निर्यात किया जाता था. दिल्ली, कागज निर्माण के लिए एक प्रमुख केंद्र लेकिन एक छोटे पैमाने पर, था.

इन सभी उद्योगों को निजी स्वामित्व के अंतर्गत चलाया जाता था. लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि बड़े स्तर पर जितने भी उद्योग थे उन्हें सरकारी स्तर पर समर्थन मिला हुआ था. सिर्फ दिल्ली में शाही कारखानों में, रेशम के लिए चार हजार से अधिक बुनकर अकेले कार्यरत थे.

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