प्राचीन काल में राजस्थान

DoTheBest
By DoTheBest May 6, 2015 13:46

प्राचीन काल में राजस्थान

मीणा राजा एम्बर (जयपुर) सहित राजस्थान के प्रमुख भागों के प्रारंभिक शासक थे। प्राचीन समय में राजस्थान मे मीना वंश के राजाओ का शासन था। संस्कृत में मत्स्य राज्य का ऋग्वेद में उल्लेख किया गया था। बाद में भील और मीना, (विदेशी लोगों) जो स्य्न्थिअन्, हेप्थलिते या अन्य मध्य एशियाई गुटों के साथ आये थे, मिश्रित हुए। मीणा राजा अम्बर (जयपुर) सहित राजस्थान के प्रमुख भागों के प्रारंभिक शासक थे। १२वीं सदी तक राजस्थान के कुछ भाग पर गुर्जरों का राज्य रहा है। गुजरात तथा राजस्थान का अधिकांश भाग गुर्जरात्र (गुर्जरों से रक्षित देश) के नाम से जाना जाता था।[1][2][3] गुर्जर प्रतिहारों ने ३०० साल तक पूरे उत्तरी-भारत को अरब आक्रान्ताओं से बचाया था।[4] बाद में जब राजपूत जाति के वीरों ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो उन भागों का नामकरण अपने-अपने वंश, क्षेत्र की प्रमुख बोली अथवा स्थान के अनुरूप कर दिया। ये राज्य थे- उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, (जालोर) सिरोही, कोटा, बूंदी, जयपुर, अलवर, भरतपुर, करौली, झालावाड़ और टोंक.[5] ब्रिटिशकाल में राजस्थान ‘राजपूताना’ नाम से जाना जाता था। राजपूत राजा महाराणा प्रताप अपनी असधारण राज्यभक्ति और शौर्य के लिये जाने जाते हैं। इन राज्यों के नामों के साथ-साथ इनके कुछ भू-भागों को स्थानीय एवं भौगोलिक विशेषताओं के परिचायक नामों से भी पुकारा जाता रहा है। पर तथ्य यह है कि राजस्थान के अधिकांश तत्कालीन क्षेत्रों के नाम वहां बोली जाने वाली प्रमुखतम बोलियों पर ही रखे गए थे। उदाहरणार्थ ढ़ूंढ़ाडी-बोली के इलाकों को ढ़ूंढ़ाड़ (जयपुर) कहते हैं। ‘मेवाती’ बोली वाले निकटवर्ती भू-भाग अलवर को ‘मेवात’, उदयपुर क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली’मेवाड़ी’ के कारण उदयपुर को मेवाड़, ब्रजभाषा-बाहुल्य क्षेत्र को ‘ब्रज’, ‘मारवाड़ी’ बोली के कारण बीकानेर-जोधपुर इलाके को ‘मारवाड़’ और ‘वागडी’ बोली पर ही डूंगरपुर-बांसवाडा अदि को ‘वागड’ कहा जाता रहा है। डूंगरपुर तथा उदयपुर के दक्षिणी भाग में प्राचीन ५६ गांवों के समूह को “”छप्पन”” नाम से जानते हैं। माही नदी के तटीय भू-भाग को ‘कोयल’ तथा अजमेर के पास वाले कुछ पठारी भाग को ‘उपरमाल’ की संज्ञा दी गई है।[6][7] आमेर रोड पर परसराम द्वारा के पिछवाड़े की डूंगरी पर विराजमान वरदराज विष्णु की एेतिहासिक मूर्ति को साहसी सैनिक हीदा मीणा दक्षिण के कांचीपुरम से लाया था। मूर्ति लाने पर मीणा सरदार हीदा के सम्मान में सवाई जयसिंह ने रामगंज चौपड़ से सूरजपोल बाजार के परकोटे में एक छोटी मोरी का नाम हीदा की मोरी रखा। उस मोरी को तोड़ अब चौड़ा मार्ग बना दिया लेकिन लोगों के बीच यह जगह हीदा की मोरी के नाम से मशहूर है। देवर्षि श्रीकृष्णभट्ट कविकलानिधि ने ईश्वरविलास महाकाव्य में लिखा है, कि कलयुग के अंतिम अश्वमेध यज्ञ के लिए जयपुर आए वेदज्ञाता रामचन्द्र द्रविड़, सोमयज्ञ प्रमुख व्यास शर्मा, मैसूर के हरिकृष्ण शर्मा, यज्ञकर व गुणकर आदि विद्वानों ने महाराजा को सलाह दी थी कि कांचीपुरम में आदिकालीन विरदराज विष्णु की मूर्ति के बिना यज्ञ नहीं हो सकता हैं। यह भी कहा गया कि द्वापर में धर्मराज युधिष्ठर इन्हीं विरदराज की पूजा करते थे। जयसिंह ने कांचीपुरम के राजा से इस मूर्ति को मांगा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब जयसिंह ने साहसी हीदा को कांचीपुरम से मूर्ति जयपुर लाने का काम सौंपा। हीदा ने कांचीपुरम में मंदिर के सेवक माधवन को विश्वास में लेकर मूर्ति लाने की योजना बना ली। कांचीपुरम में विरद विष्णु की रथयात्रा निकली तब हीदा ने सैनिकों के साथ यात्रा पर हमला बोला और विष्णु की मूर्ति जयपुर ले आया। इसके साथ आया माधवन बाद में माधवदास के नाम से मंदिर का महंत बना। अष्टधातु की बनी सवा फीट ऊंची विष्णु की मूर्ति के बाहर गणेशशिव पार्वती विराजमान हैं। सार-संभाल के बिना खंडहर में बदल रहे मंदिर में महाराजा को दर्शन का अधिकार था। अन्य लोगों को महाराजा की इजाजत से ही दर्शन होते थे। महंत माधवदास को भोग पेटे सालाना 299 रुपये व डूंगरी से जुड़ी 47 बीघा 3 बिस्वा भूमि का पट्टा दिया गया। महंत पं॰ जयश्रीकृष्ण शर्मा के मुताबिक उनके पुरखों को 341 बीघा भूमि मुरलीपुरा में दी थी, जहां आज विद्याधर नगर बसा है। अन्त्या की ढाणी में 191 बीघा 14 बिस्वा भूमि पर इंडियन आयल के गोदाम बन गए हैं।

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