बौद्ध के युग में प्रशासनिक ढाँचा व सामाजिक जीवन (563- 483 B C )

DoThe Best
By DoThe Best October 3, 2015 14:39

प्रशासनिक ढांचा

राजा अपने सबसे ऊंचे पद का आनंद लेता था और  सारे अधिकारी चाहे वह उच्च श्रेणी के हो या निम्न श्रेणी के राजा की मदद करते थे | राजा सेनापति हुआ करता था जिसका प्रमुख कर्तव्य अपने राज्य का हर जीत में नेत्रत्व करना था | केंद्र में उच्च अधिकारियों को महामंत्री के रूप में जाना जाता था | इन्हे शाही स्त्रीग्रह में कमांडर, मंत्री, मुख्य मुनीम, न्यायधीश तथा मुखिया के रूप में नियुक्त किया जाता था |

राज्य स्तर के उच्च अधिकारियों को अIयुक्त के नाम से जाना जाता था

ज़्यादातर राजा क्षत्रिय वर्ण से संबंध रखते थे जबकि मंत्री ब्राह्मण वर्ण से संबंध रखते थे | राजा का पद हमेशा वंशानुगत था |

ग्रामीणों पर उनके संबंधित मुखिया प्रशासन करते थे | मुखिया का कार्य ग्रामीणों से कर लेने के साथ कानून और व्यवस्था  भी बनाए रखना था | इन्हें ग्रामिणी, ग्रामभोजक या ग्रामिका के नाम से जाना जाता था |

जो अधिकारी पथ कर एकत्रित करते थे उन्हें शौल्कीक अथवा शुल्कध्यक्ष के नाम से जाना जाता था |

सामाजिक जीवन

समाज चार जातियों में विभाजित था – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र

हर  एक जाति का कार्य समाज ने साफ़ निर्धारित किया हुआ था | क्षत्रिय जाति के लोग अपने देश के लिए लड़ते व बचाव करते थे  जबकि ब्राह्मण जाति के लोग राजा के पुजारी, गुरु व सलाहकार के रूप में

कार्य करते थे | वैश्य जाति में व्यापारी  व किसान आते थे जबकि शूद्र जाति में मज़दूर आते थे जो तीनों जातियों की सेवा करते थे |

शूद्र जाति वालों केओ समाज में सबसे निम्न स्थान होता था तथा इनके पास कोई भी क़ानूनी या धार्मिक अधिकार नहीं थे | समाज के उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों के साथ विवाह नहीं करते थे तथा उनसे दूरी बनाए रखते थे | यहाँ तक की नए धर्म जैसे बौद्ध और जैन धर्म भी समाज में कोई बदलाव नहीं ला पाये |

12वीं A D  के शुरुआत में बौद्ध धर्म भारत में समाप्त हो गया | यह बिहार व बंगाल में 11वीं सदी तक अपने बदले रूप में रहा परन्तु इसके बाद यह देश से पूरी तरह लुप्त हो गया |

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