भारत के इतिहास में विकृतियाँ की गईं, क्या-क्या?

DoThe Best
By DoThe Best September 30, 2017 11:40

भारत के इतिहास में विकृतियाँ की गईं, क्या-क्या?

ईसा की 16वीं – 17वीं शताब्दी में व्यापारी बनकर आएअंग्रेज 18वीं शताब्दी के अन्त तक आते-आते 200 वर्ष के कालखण्ड में छल से, बल से औरकूटनीति से भारतीय नरेशों की सत्ताएँ हथिया कर देश की प्रमुख राजशक्ति ही नहीं बन गए वरन वे देश की बागडोर संभालने में भी सफल हो गए। अपनी सत्ता को ऐतिहासिक दृष्टि से उचित ठहराने के लिएतत्कालीन कम्पनी सरकार ने भारत के इतिहास में विकृतियाँ लाने के लिए विभिन्न प्रकार की भ्रान्तियों का निर्माण कराकर उनको विभिन्न स्थानों पर विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न प्रकार से प्रचारित कराया। यहाँ कुछ विकृतियों का उल्लेख 4 खण्डों, यथा- ऐतिहासिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक और विविध में वर्गीकृत करके किया जा रहा है-

ऐतिहासिक

आर्य लोग भारत में बाहर से आए

अंग्रेजों ने भारत में विदेश से आकर की गई अपनी सत्ता की स्थापना को सही ठहराने के उद्देश्य से ही आर्यों के सम्बन्ध में, जो कि यहाँ केमूल निवासी थे, यह प्रचारित कराना शुरू कर दिया कि वे लोग भारत में बाहर से आए थे और उन्होंने भी बाहर से ही आकर यहाँ अपनी राज्यसत्ता स्थापित की थी। फिर उन्होंने आर्यों को ही नहीं, उनसे पूर्वआई नीग्रीटो, प्रोटो आस्ट्रोलायड, मंगोलाभ, द्रविड़ आदि विभिन्न जातियों को भी भारत के बाहर से आने वालीबताया।

यह ठीक है कि पाश्चात्य विद्वान और उनके अनुसरण में चलने वाले भारतीय इतिहासकार ‘आर्यों‘ को भारत में बाहर से आने वाला भले ही मानते हों किन्तु भारत के किसी भी स्रोत से इस बात की पुष्टि नहीं होती। अनेक भारतीय विद्वान इसे मात्र एक भ्रान्ति से अधिक कुछ नहीं मानते। भारत के अधिकांश वैदिक विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि यहाँ की किसी भी प्राचीन साहित्यिक या अन्य प्रकार की रचना में कोई भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता, जिससे यह सिद्ध होता हो कि आर्यों ने बाहर से आकर यहाँ राज्य सत्ता स्थापित की थी।

आर्यों के आदि देश, आर्य भाषा, आर्य सभ्यता औरसंस्कृति के सम्बन्ध में सबसे प्राचीन और प्रामाणिक साक्ष्य ऋग्वेद है। यह आर्यों का ही नहीं विश्वका सबसे प्राचीन ग्रन्थ माना जाता है किन्तु इसमें जितना भी भौगोलिक या सांस्कृतिक उल्लेख आता है वहसब इसी देश के परिवेश का है। ‘ऋग्वेद‘ के नदी सूक्त में एक भी ऐसी नदी का नाम नहीं मिलता जो भारत के बाहर की हो। इसमें गंगा, सिन्धु, सरस्वती आदि का ही उल्लेख आता है। अतः इन नदियों सेघिरी भूमि ही आर्यों का देश है और आर्य लोग यहीं के मूल निवासी हैं। यदि आर्य कहीं बाहर से आए होते तो कहीं तो उस भूमि अथवा परिवेश का कोई तो उल्लेख ऋग्वेद में मिलता।

इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि आर्यों ने भारतको ही अपनी मातृभूमि, धर्मभूमि और कर्मभूमि मानकर जिस रूप में अपनाया है वैसा किसी भी पराए देश का निवासी उसको नहीं अपना सकता था। यहाँ यह भी बात ध्यान देने योग्य है कि आर्यों ने सप्तसिन्धु के बाहर के निवासियों को बहुत ही घृणापूर्वक ‘म्लेच्छ‘ कहकर पुकारा है – ‘म्लेच्छ देश ततः परः।‘ (मनु.) क्या ऐसा कहने वाले स्वयं म्लेच्छ देश से आने वाले हो सकते हैं, ऐसा नहीं हो सकता।

दूसरी ओर भारत के इतिहास लेखन के क्षेत्र में 18वीं और 19वीं शताब्दी में आने वाले पाश्चात्य विद्वानों ने अपने तर्कों के सामने, भले ही वे अनर्गल ही क्यों न रहे हों, इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। उल्टे अपने कथ्यों से सभी को इस प्रकार का विश्वास दिलाने का पूरा प्रयास किया कि आर्य लोग भारत में बाहर से ही आए थे जबकि भारत के संदर्भ में विश्व केभिन्न-भिन्न देशों में मिल रहे प्राचीन ऐतिहासिक एवं साहित्यिक ब्योरों तथा उत्खननों में मिल रही पुरातात्विक सामग्रियों का जैसे-जैसे गहन अध्ययन होता जा रहा है, वैसे-वैसे विद्वान लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे हैं कि भारत ही आर्यों का मूल स्थान है और यहीं से आर्य बाहर गए थे। वे लोग बाहर से यहाँनहीं आए थे।

इस दृष्टि से विदेशी विद्वानों में से यूनान के मेगस्थनीज, फ्राँस के लुई जैकालियट, इंग्लैण्ड के कर्जन, मुरो, एल्फिन्सटन आदि तथा देशी विद्वानों में से स्वामी विवेकानन्द, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. सम्पूर्णानन्द, डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा हैकि आर्य भारत में विदेशी नहीं थे। दूसरी ओर मैक्समूलर, पोकॉक, जोन्स, कुक टेलर, नारायण पावगी, भजनसिंह आदि अनेक विदेशी और देशी विद्वानों का तो यह मानना रहा है कि आर्य विदेशों से भारत में नहीं आए वरन भारत से ही विदेशों में गए हैं।

जिस समय यूरोप के अधिकांश विद्वान और भारत के भी अनेक इतिहासकार यह मान रहे थे कि आर्य भारत में बाहर से आए, तभी 1900 ई. में पेरिससम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द जी ने यह सिंह गर्जना की थी कि यह एक मूर्खतापूर्ण प्रलाप मात्र है कि भारत में आर्य बाहर से आए हैं –

“Where is your proof, guess work, then keep your fancifulguess to your self. In which veda, in which sutra do you find that Aryans have come into India from a foreign country ? What your European pundits say about the Aryan’s swooping down from some foreign land, snatchng away the lands of aborigines and settling in India by exterminating them, is all pure non sense, foolish talk !”

आर्यों के भारत से विदेशों में जाने की दृष्टि से जब प्राचीन भारतीय वाङ्मय का अध्ययन किया जाता है तो ज्ञात होता है कि अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत के लोग एक-दो बार नहीं वरन बार-बार विदेश जाते रहे हैं। इनका प्रव्रजन कभी राजनीतिक कारणों से, यथा- ऋग्वेद और जेन्द अवेस्ता के अनुसार देवयुग में इन्द्र की सत्ता के भय से त्वष्टा का और विष्णुपुराण के अनुसार महाराजा सगर से युद्ध में हार जाने पर व्रात्य बना दिए जाने से शक, काम्बोज,पारद आदि क्षत्रिय राजाओं का और कभी सामाजिक कारणों, यथा- ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार विश्वामित्र के 50 पुत्रों के निष्कासन आदि से हुआ है। महाभारत युद्ध में मृत्यु के भय या हार जाने पर अपमानित महसूस करने पर आत्मग्लानी के और श्रीकृष्ण जी के स्वर्गारोहण से पूर्व हुए यादवी संघर्ष के फलस्वरूप भी बहुत से लोग भागकर देश के बाहर गए थे। यही नहीं, कभी-कभी स्वेच्छा से व्यापार, भ्रमण, धर्म प्रसार और उपनिवेश-निर्माण के हेतु भी भारतीयों ने प्रव्रजन किया है।

आर्यों ने भारत के मूल निवासियों को युद्धों में हराकर दास या दस्यु बनाया

अंग्रेजों द्वारा अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ‘बांटों और राज्य करो‘ की नीति के अनुसार फैलाई गई विभिन्न भ्रान्तियों में से ही यह भी एक थी। सर्वप्रथम यह विचार ‘कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया‘ में प्रतिपादित किया गया था कि आर्य लोगों ने विदेशों से आकर भारत पर आक्रमण करके यहाँ के मूल निवासी द्रविड़, कोल, भील, सन्थाल आदि को अपनी शक्ति के बल पर पराजित करके जीता और अपमानित करके उन्हें दास या दस्यु बनाया।

आर्यों द्वारा बाहर से आकर स्थानीय जातियों को जीतने के प्रश्न पर भारत के प्रसिद्ध विधिवेत्ता डॉ. अम्बेडकर ने लिखा है कि ऋग्वेद में ‘दास‘ और ‘दस्यु‘ को आर्यों का शत्रु अवश्य बताया गया है और उसमें ऐसे मंत्र भी आए हैं, जिसमें वैदिक ऋषियों ने अपने देवताओं से उनको मारने और नष्ट करने की प्रार्थनाएँ भी की हैं किन्तु इससे भारत में आर्यों के आक्रमण के पक्ष में निर्णय नहीं किया जा सकता। उन्होंने ऋग्वेद के आधार पर इस सम्बन्ध में तीन तर्क प्रस्तुत किए हैं-

  • (1) ऋग्वेद में आर्यों और दासों या दस्युओं के बीच युद्धों के संदर्भ नहीं मिलते। ऋग्वेद में 33 स्थानों पर ‘युद्ध‘ शब्द आया है, जिनमें से केवल आठ स्थानों में उसका प्रयोग ‘दस्यु‘ के विरोधी अर्थ में हुआ है और वह भी दोनों के मध्य किसी बड़े युद्ध को नहीं, बल्कि छिटपुट लड़ाइयों को ही दर्शाता है, जिनके आधार पर आर्यों की विजय-कथा को प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
  • (2) दासों और आर्यों के बीच जो भी छिटपुट संघर्ष था, वह दोनों की आपसी सहमति से शान्तिपूर्ण ढंग से तय हो गया था। ऋग्वेद (6. 33. 3,7. 83. 1, 8. 51. 9, 10. 102. 3) से यह भी स्पष्ट होता है कि दासों और आर्यों का एक ही शत्रु था और दोनों ने मिलकर अपने शत्रु के विरुद्ध युद्ध किया था।
  • (3) संघर्ष या विरोध का कारण जातीय नहीं था, अपितु उपासना भेद था। स्वयं ऋग्वेद से ही यह प्रमाणित होता है कि यह संघर्ष उपासना भेद के कारणों से उत्पन्न हुआ था, जाति के भेद के कारण नहीं क्योंकि, ऋग्वेद के मंत्र (1. 51. 8, 1. 32. 4, 4. 41. 2, 6. 14. 3) बताते हैं कि आर्यों और दासों या दस्युओं के उपासना से सम्बंधित आचार-विचार भिन्न-भिन्न थे।

डॉ. अम्बेडकर ने अपने मत की पुष्टि में ऋग्वेद के मंत्र सं. 10.22.8 को विशेष रूप से उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है –

‘‘हम दस्युओं के बीच में रहते हैं। वे लोग न तो यज्ञ करते हैं और न किसी में विश्वास ही करते हैं। इनके रीति-रिवाज भी पृथक हैं। वे मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं हैं। हे, शत्रु हंता ! तू उनका नाश कर।‘‘

डॉ. साहब का कहना है कि ऐसे मंत्रों के सामने दासों या दस्युओं को आर्यों द्वारा विजित करने के सिद्धान्त को किसी प्रकार से नहीं माना जा सकता। अपने कथन की पुष्टि में डॉक्टर साहब ने श्री पी. टी. आयंगर के लेख का एक उद्धरण दिया है-

‘‘मंत्रों के परीक्षण से ज्ञात होता है कि उनमें जो आर्य, दास या दस्यु शब्द आए हैं, वे जाति-सूचक नहीं हैं, अपितु उनसे आस्था या उपासना का बोध होता है। वे शब्द मुख्य रूप से ऋग्वेद-संहिता में आए हैं। इनसे कहीं भी यह प्रमाणितनहीं होता कि जो जातियाँ अपने-आपको आर्य कहती थीं, वे हमलावर थीं और उन्होंने इस देश कोविजित करके यहाँ के लोगों का नाश किया था …‘‘

दास या दस्यु कौन थे, इस संदर्भ में कुल्लूक नाम के एक विद्वान का यह कथन, जो उसने मनुस्मृति की टीका में लिखा है, उल्लेखनीय है- ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र जाति में, जो क्रियाहीनता के कारण जातिच्युत हुए हैं, वे चाहे म्लेच्छभाषी होंया आर्यभाषी, सभी दस्यु कहलाते हैं।

ऋग्वेद का यह मंत्र –

अकर्मादस्युः अमिनो अमन्तु अन्यव्रती अमानुषः ।
त्वं तस्य अभिन्न हन वधोदासस्य दम्भये ।।

कर्महीन, मननहीन, विरुद्धव्रती और मनुष्यता से हीन व्यक्तिको दस्यु बताकर उसके वध की आज्ञा देता है और ‘दास‘ तथा ‘दस्यु‘ को अभिन्नार्थी बताता है। यदि दस्यु का अर्थ आज की भाँति दास या सेवक होता तो ऐसी आज्ञा कभी नहीं दी जाती।

ऐतरेय ब्राह्मण में एक स्थान पर कहा गया है – ‘‘तुम्हारे वंशधर भ्रष्ट होंगे। यही (भ्रष्ट या संस्कार विहीन) आन्ध्र, पुण्ड्र, शवर आदि उत्तर दिक् वासी अनेकजातियाँ हैं‘‘ दूसरे शब्दों में सभ्यता और संस्कार विहीन लोगों की वंश परम्पराएँ चलीं और स्वतः ही अलग-अलग जातियाँ बन गईं, इन्हें किसी ने बनाया नहीं। आज की जरायमपेशा जातियों में ब्राह्मण भी हैं और राजपूत भी।

श्रीरामदास गौड़ कृत ‘हिन्दुत्व‘ के पृष्ठ 772 पर दिए गएउक्त उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि दस्यु या दास कैसे बने ? अतः आर्यों द्वारा भारत केमूल निवासियों को हराकर उन्हें दास या दस्यु बनाने की बात एक भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं।

भारत के मूल निवासी द्रविड़

अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत में यह कोई जानताही नहीं था कि द्रविड़ और आर्य दो अलग-अलग जातियाँ हैं। यह बात तो देश में अंग्रेजों के आने के बाद ही सामने लाई गई। अंग्रेजों को यह कहना भी इसलिए पड़ा क्योंकि वे आर्यों को भारत में हमलावर बनाकर लाए थे। हमलावर के लिए कोई हमला सहने वाला भी तो चाहिए था। बस, यहीं से मूल निवासी की कथा चलाई गई और इसे सही सिद्ध करने के उद्देश्य से ‘द्रविड़‘ की कल्पना की गई। अन्यथाभारत के किसी भी साहित्यिक, धार्मिक या अन्य प्रकार के ग्रन्थ में इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता कि द्रविड़ और आर्य कहीं बाहर से आए थे। यदि थोड़ी देर के लिए इस बात को मान भी लियाजाए कि आर्यों ने विदेशों से आकर यहाँ के मूल निवासियों को युद्धों में हराया था तो पहले यह बताना होगा कि उन मूल निवासियों के समय इस देश का नाम क्या था ? क्योंकि जो भी व्यक्ति जहाँ रहते हैं, वे उस स्थान का नाम अवश्य रखते हैं। जबकि किसी भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थ या तथाकथित मूल निवासियों की किसी परम्परा या मान्यता में ऐसे किसी भी नाम का उल्लेख नहीं मिलता।

‘संस्कृति के चार अध्याय‘ ग्रन्थ के पृष्ठ 25 पर रामधारीसिंह ‘दिनकर‘ का कहना है कि जाति या रेस (race) का सिद्धान्त भारत में अंग्रेजों के आने के बाद ही प्रचलित हुआ, इससे पूर्व इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि द्रविड़ और आर्य जाति के लोग एक दूसरे को विजातीय समझते थे। वस्तुतः द्रविड़ आर्यों के ही वंशज हैं। मैथिल, गौड़, कान्यकुब्ज आदि की तरह द्रविड़ शब्द भी यहाँ भौगोलिक अर्थ देने वाला है। उल्लेखनीय बात तो यह है कि आर्यों के बाहरसे आने वाली बात को प्रचारित करने वालों में मि. म्यूर, जो सबके अगुआ थे, को भी अन्त में निराश होकर यह स्वीकार करना पड़ा है कि – ‘‘किसी भी प्राचीन पुस्तक या प्राचीन गाथा से यह बात सिद्ध नहीं की जा सकती कि आर्य किसी अन्य देश से यहाँ आए।‘‘ (‘म्यूर संस्कृत टेक्स्ट बुक‘ भाग-2, पृष्ठ 523)

इस संदर्भ में टामस बरो नाम के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता का ‘क्लारानडन प्रेस, ऑक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित और ए. एल. भाषम द्वारा सम्पादित ‘कल्चरल हिस्ट्री ऑफ इण्डिया‘ में छपे ‘दि अर्ली आर्यन्स‘ में उद्धृत यह कथन उल्लेखनीय है कि- ‘‘आर्यों के भारत पर आक्रमण का न कहीं इतिहास में उल्लेख मिलता है और न इसे पुरातात्त्विक आधारों पर सिद्ध किया जा सकता है‘‘ (‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता‘, पृष्ठ-126 पर उद्धृत)

इस संदर्भ में रोमिला थापर का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि ‘‘आर्यों के संदर्भ में बनी हमारी धारणाएँ कुछ भी क्यों न हों, पुरातात्त्विक साक्ष्यों से बड़े पैमाने पर किसी आक्रमण या आव्रजन का कोई संकेत नहीं मिलता …… गंगा की उपत्यका के पुरातात्त्विक साक्ष्यों से यह प्रकट नहीं होता कि यहाँ के पुराने निवासियों को कभी भागना या पराजित होना पड़ा था।‘‘ (‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता‘, पृ. 113 पर उद्धृत)

अंग्रेजों ने इस बात को भी बड़े जोर से उछाला है कि ‘आक्रान्ता आर्यों‘ ने द्रविड़ों के पूर्वजों पर नृशंस अत्याचार किए थे। वाशम, नीलकंठ शास्त्री आदि विद्वान यद्यपि अनेक बार यह लिख चुके हैं कि ‘आर्य‘ और ‘द्रविड़‘ शब्द नस्लवाद नहीं है फिर भी संस्कृत के अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर बने लेखक, साम्राज्यवादी प्रचारक और राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धिको सर्वोपरि मानने वाले नेता इस विवाद को आँख मींच कर बढ़ावा देते रहे हैं। पाश्चात्य विद्वानोंने द्रविड़ों की सभ्यता को आर्यों की सभ्यता से अलग बताने के लिए ‘हड़प्पा कालीन सभ्यता‘ को एक बड़े सशक्तहथियार के रूप में लिया था। पहले तो उन्होंने हड़प्पाकालीन सभ्यता को द्रविड़ सभ्यता बताया किन्तु जब विभिन्न विद्वानों की नई खोजों से उनका यह कथन असत्य हो गया तो वे कहने लगे कि हड़प्पा के लोग वर्तमान ‘द्रविड़‘ नहीं, वे तो भूमध्य सागरीय ‘द्रविड़‘ थे – अर्थात वे कुछ भी थे किन्तु आर्य नहीं थे। इस प्रकार की भ्रान्तियाँ जान-बूझकर फैलाई गई थीं। जबकि सत्य तो यह है कि हड़प्पा की सभ्यता भी आर्य सभ्यता का ही अंश थी और आर्य सभ्यता वस्तुतः इससे भी हजारों-हजारों वर्ष पुरानी है।

इससे यही सिद्ध होता है कि आर्य और द्रविड़ अलग नहीं थे। जब अलग थे ही नहीं तो यह कहना कि भारत के मूल निवासी आर्य नहीं द्रविड़ थे, ठीक नहीं है। अब समय आ गया है कि आर्यों के आक्रमण और आर्य-द्रविड़ भिन्नता वाली इस मान्यता को विभिन्न नई पुरातात्विक खोजों और शोधपरक अध्ययनों के प्रकाश में मात्र राजनीतिक ‘मिथ‘ मानकर त्याग दिया जाना चाहिए।

दासों या दस्युओं को आर्यों ने अनार्य बनाकर शूद्रकी कोटि में डाला

भारतीय समाज को जाति, मत, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर बांटकर उसकी एकात्मता छिन्न-भिन्न करने के लिए ही अंग्रेजी सत्ता ने यह भ्रान्ति फैलाई थी कि आर्यों ने बाहर से आकर यहाँ पर पहले से रह रहीं जातियों को युद्धों में हराकर दास या दस्यु बनाकर बाद में अपनी संस्कृति में दीक्षित कर उन्हें शूद्र की कोटि में डाल दिया। इस संदर्भ मेंकई प्रश्न उठते हैं कि क्या दास या दस्यु आर्येतर जातियाँ थीं, यदि नहीं, तो इन्हें अनार्य घोषित करने के पीछे अभिप्राय क्या था और क्या शूद्र कोटि भारतीय समाज में उस समय घृणित या अस्पृश्य अथवा छोटी मानी जाती थी ? इन प्रश्नों पर पृथक-पृथक विचार करना होगा।

क्या दास या दस्यु आर्येतर जातियाँ थीं? – दास या दस्यु आर्येतर जातियाँ थीं या नहीं, यह जानने के लिए पहले यह देखना होगा कि आर्य वाङ्मय में दास या दस्यु शब्द का प्रयोग किस-किस अर्थ में अथवा किस अभिप्राय से किया गया है। आर्यों के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद के मंत्र संख्या 1. 5. 19 तथा 9. 41. 2 में दास या दस्यु शब्द का प्रयोग अयाज्ञिकऔर अव्रतों के लिए और मंत्र संख्या 1. 51. 8 में इसका प्रयोग शत्रु, चोर, डाकू अथवा धार्मिक क्रियाओंका विनाश करने वालों के लिए किया गया है। मनुस्मृति के 10.4 में कम्बोज आदि जातियों के पतित हो जाने वाले लोगों को दास या दस्यु कहा गया है। महाभारत के भीष्म पर्व में निष्क्रिय व्यक्तियों को दास या दस्यु शब्द से अभिहित किया गया है। स्पष्ट है कि इन शब्दों का प्रयोग सभी जगह कुछ विशिष्ट प्रकार के लोगों के लिए ही किया गया है, किसी जाति विशेष के रूप में नहीं।

इनको अनार्य बनाने के पीछे क्या अभिप्राय रहा? -आर्य वाङ्मय में स्थान-स्थान पर ‘अनार्य‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। वाल्मीकि रामायणके 2. 18. 31 में दशरथ की पत्नी कैकेई के लिए ‘अनार्या‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में ‘‘अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन‘‘ के माध्यम से अकीर्तिकर कार्यों के लिए ‘अनार्यजुष्ट‘ जैसे शब्दोंका प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद के मंत्र संख्या 7. 6. 3 के अनुसार अव्रतियों, अयाज्ञिकों, दंभिओं, अपूज्यों और दूषित भाषा का प्रयोग करने वालों के लिए ‘मृघ्रवाच‘ शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात किसी भी आर्य ग्रन्थ में ‘अनार्य‘ शब्द जातिवाचक के रूप में प्रयुक्त नहीं हुआ है। स्पष्ट है कि ऋग्वेद आदि में स्थान-स्थान पर आए अनार्य, दस्यु, कृष्णगर्भा, मृघ्रवाच आदि शब्द आर्यों से भिन्न जातियों के लिए न होकर आर्य कर्मों से च्युत व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त हुए हैं अर्थात ‘अनार्य‘ शब्द जातिवाचक रूप में कहीं भी प्रयोगमें नहीं लाया गया।

क्या शूद्र कोटि भारतीय समाज में उस समय घृणित या अस्पृश्य अथवा छोटी मानी जाती थी? – प्राचीन काल में भारतीय समाज के चारों वर्ण यथा- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र परस्पर सहयोगी थे। एक वर्ण दूसरे में जा सकता था। उस समय वर्ण नहीं समाज में उसकी उपयोगिता कर्म की प्रमुखता से थी। भारत के किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में कहीं भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता, जहाँ कहा गया हो कि शूद्र घृणित या अस्पृश्य या छोटा होता है या उच्च वर्ग बड़े होते हैं। समाज में सभी का समान महत्त्व था।

चारों वर्णों को समाज रूपी शरीर के चार प्रमुख अंग माना गया था, यथा- ब्राह्मण-सिर, क्षत्रिय-बाहु, वैश्य-उदर और शूद्र-चरण। चारों वर्णों की समान रूप से अपनी-अपनी उपयोगिता होते हुए भी शूद्र की उपयोगिता समाज के लिए सर्वाधिक रही है।समाज रूपी शरीर को चलाने, उसे गतिशील बनाने और सभी कार्य व्यवहार सम्पन्न कराने का सम्पूर्ण भार वहन करने का कार्य पैरों का होता है। भारतीय समाज में शूद्रों के साथ छुआछूत या भेदभाव का व्यवहार, जैसा कि आजकल प्रचारित किया जाता है, प्राचीन काल में नहीं था। वैदिक साहित्य से तो यहभी प्रमाणित होता है कि ‘शूद्र‘ मंत्रद्रष्टा ऋषि भी बन सकते थे। ‘कवष ऐलुषु‘ दासीपुत्र अर्थात शूद्र थे किन्तु उनकी विद्वत्ता को परख कर ऋषियों ने उन्हें अपने में समा लिया था। वे ऋग्वेद की कई ऋचाओं के द्रष्टा थे। सत्यकाम जाबालि शूद्र होते हुए भी यजुर्वेद की एक शाखा के प्रवर्तक थे। (छान्दोगय 4.4) इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ‘‘शूद्रो को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है‘‘, ऐसा कहने वाले झूठे हैं। कारण शूद्रों द्वारा वेद-पाठ की तो बात ही क्या वे तो वेद के मंत्र द्रष्टा भी थे। सामाजिक दृष्टि से यह भेदभाव तो मुख्यतः मुसलमानों और अंग्रेजों द्वारा अपने-अपने राज्यकालों में इस देश के समाज को तोड़ने के लिए पैदा किया गया था।

वस्तुतः वर्ण व्यवस्था समाज में अनुशासन लाने के लिए,उसकी उन्नति के लिए और उसके आर्थिक विकास के लिए बनाई गई थी।

डॉ. अम्बेडकर ने अपनी रचना ‘शूद्र पूर्वी कोण होते‘ के पृष्ठ 66 और 74-75 पर बड़े प्रबल प्रमाणों से सिद्ध किया है कि शूद्र वर्ण समाज से भिन्न नहीं है अपितु क्षत्रियों का ही एक भेद है। संस्कृत साहित्य में सदाचरण या असदाचरण के आधार पर ही ‘आर्य‘, ‘अनार्य‘, ‘दस्यु‘, ‘दास‘ आदि संज्ञाओं का प्रयोग किया गया है। वास्तव में ‘आर्य‘ शब्द को सुसंस्कारों से सम्पन्न धर्माचरण करने वाले व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया गया है।

अतः यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय समाज को तोड़ने के लिए फैलाई गई एक भ्रान्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

यूरोपवासी आर्यवंशी

अंग्रेजी सत्ता के उद्देश्य की पूर्ति में लगे न केवल अंग्रेज विद्वान ही वरन उनसे प्रभावित और उनकी योजना में सहयोगी बने अन्य पाश्चात्य विद्वान, यथा- मैक्समूलर, वेबर, विंटर्निट्ज आदि भी शुरू-शुरू में भारत के इतिहास और साहित्य तथा सभ्यता और संस्कृति की प्राचीनता, महानता और श्रेष्ठता को नकारते ही रहे तथा भारत के प्रति बड़ी अनादर और तिरस्कार की भावना भी दिखाते रहे किन्तु जब उन्होंने देखा कि यूरोप के ही काउन्ट जार्नस्टर्जना, जैकालियट, हम्बोल्ट आदि विद्वानों ने भारतीय साहित्य, सभ्यता और संस्कृति की प्रभावी रूप में सराहना करनी शुरू कर दी है तो इन लेखकों ने इस डर से कि कहीं उनको दुराग्रही न मान लिया जाए, भारत की सराहनाकरनी शुरू कर दी। इन्होंने यह भी सोचा कि यदि हम यूँ ही भारतीय ज्ञान-भण्डार का निरादर करते रहेतो विश्व समाज में हमें अज्ञानी माना जाने लगेगा अतः इन्होंने भी भारत के गौरव, ज्ञान और गरिमा का बखान करना शुरू कर दिया। कारण यह रहा हो या अन्य कुछ, विचार परिवर्तन की दृष्टि से पाश्चात्य विद्वानों के लेखन में क्रमशः आने वाला अन्तर एकदम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है –

पहली स्थिति में इन विद्वानों ने भारत की निन्दा की, दूसरी स्थिति में सराहना की और बाद में तीसरी स्थिति में गुण-ग्राहकता दिखाई। इनके विचार किस प्रकार बदले हैं, यह बात निम्नलिखित उद्धरणों से अधिक स्पष्ट हो जाती है –

पहली स्थिति: तिरस्कार और निन्दा

(1) India has been conquered once but India must be conquered again and the second conquest should be attained by education. .. भारत को एक बार जीता जा चुका है, अवश्य ही इसे पुनः जीतना होगा, किन्तु इस बार शिक्षा के माध्यम से।‘‘

(‘विश्वव्यापिनी संस्कृति‘, पृ. 95 पर उद्धृत)

(2) Large number of Vedic hymns are childish in the extreme, tedious, low, common place (वेद की अधिकांश ऋचाएँ बचकानी, क्लिष्ट, निम्न और अतिसामान्य है।)

(‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता‘, पृ. 21 परउद्धृत)

दूसरी स्थिति: सराहना  : ‘‘जिसने बर्कले का दर्शन, उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्रोंका समान रूप से अध्ययन किया है वह विश्वास के साथ कहेगा कि उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्रोंके सामने वर्कले का दर्शन नितान्त अधूरा और बौना है।‘‘

(‘विश्वव्यापिनी संस्कृति‘, पृ. 46 पर उद्धृत)

तीसरी स्थिति: गुणग्राहकता

(1) ‘‘यूरोपीय राष्ट्रों के विचार, वाङ्मय और संस्कृति के स्रोत तीन ही रहे हैं- ग्रीस, रोम तथा इज्राइल। अतः उनका आध्यात्मिक जीवन अधूरा है, संकीर्णहै। यदि उसे परिपूर्ण, भव्य, दिव्य और मानवीय बनाना है तो मेरे विचार में भाग्यशाली भरतखण्ड का ही आधार लेना पड़ेगा।‘‘

(‘विश्वव्यापिनी संस्कृति‘, पृ. 51 पर उद्धृत)

(2) ‘‘आचार्य (शंकर) भाष्य का जब तक किसी यूरोपीय भाषा में सुचारु अनुवाद नहीं हो जाता तब तक दर्शन का इतिहास पूरा हो ही नहीं सकता। भाष्य की महिमा गाते हुए साक्षात सरस्वती भी थक जाएगी।

(‘विश्वव्यापिनी संस्कृति‘, पृ. 46-47 पर उद्धृत)

किन्तु इस तीसरी स्थिति के बावजूद भी यूरोपीय लेखकयह स्वीकार करने में असमर्थ रहे कि यूरोप वाले आर्यों (भारतीयों) से निचले स्तर पर रहे थे। अतः उन्होंने संस्कृत और लैटिन आदि भाषाओं के शब्दों की समानता को लेकर ‘‘एक ही भाषा के बोलनेवाले एक ही स्थान पर रहे होंगे‘‘ के सिद्धान्त की स्थापना की और इस प्रकार आर्यों से यूरोप वालों का रक्त सम्बन्ध स्थापित कर दिया। मैक्समूलर आदि अनेक पाश्चात्य विद्वानों ने पहले तो आर्यों को एक जाति विशेष बनाया और धीरे-धीरे एक के बाद एक कई ऐसे यूरोपीय विद्वान आए जिन्होंने आर्यों के गुणों से आकृष्ट होकर यूरोपीय लोगों को इस जाति विशेष से ही जोड़ दिया। इस संदर्भ में मैक्समूलर का कहना है कि-

‘‘आर्यवर्त्त का प्राचीन देश ही गोरी जाति का उत्पत्ति स्थान है। भारत भूमि ही मानव जाति की माता और विश्व की समस्त परम्पराओं का उद्गम-स्थल है।उत्तर भारत से ही आर्यों का अभियान फारस की ओर गया था।‘‘ (‘इण्डिया, व्हाट इट कैन टीच अस‘)

मैक्समूलर ने यह भी कहा है कि –

यह निश्चित हो चुका है कि हम सब पूर्व की ओर से आए हैं। इतना ही नहीं हमारे जीवन की जितनी भी प्रमुख और महत्त्वपूर्ण बातें हैं, सबकी सब हमें पूर्व से मिली हैं। ऐसी स्थिति में जब हम पूर्व की ओर जाएं तब हमें यह सोचना चाहिए कि पुरानी स्मृतियों को संजोए हम अपने पुराने घर की ओर जा रहे हैं।

(‘इण्डिया, व्हाट इट कैन टीच अस‘, पृ. 29)

कर्जन तो स्पष्ट रूप से कहता है कि- ‘‘गोरी जाति वालों का उद्गम स्थान भारत ही है।‘‘ (जनरल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी‘, खण्ड 16, पृ.172-200)

भारतीय मनीषी तो चाहे प्राचीन काल के रहे हों या अर्वाचीन काल के, यही मानते हैं कि आर्य कोई जाति विशेष नहीं है।

उक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि वेदों सहित समस्त प्राचीन भारतीय साहित्य में जहाँ भी ‘आर्य‘ शब्द का प्रयोग किया गया है, वहाँ ‘श्रेष्ठ व्यक्ति‘ के लिए ही किया गया है। इस श्रेष्ठत्त्व से भारतवासी ही आवेष्टित क्यों हों यूरोप वाले क्यों नहीं, अतः उन्होंने इस श्रेष्ठत्त्व से यूरोपवालों को महिमामंडित करने का सुअवसर हाथ से खोना नहीं चाहा और उन्हें भी आर्यवंशी बना दिया।

इस संदर्भ में जार्ज ग्रियर्सन का अपनी रिपोर्ट ‘ऑन दिलिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया‘ में उल्लिखित यह कथन दर्शनीय है – ‘‘भारतीय मानव स्कन्ध में उत्पन्न भारत-तूरानी अपने को वास्तविक अर्थ में साधिकार ‘आर्य‘ कह सकते हैं किन्तु हम अंग्रेजों को अपने को ‘आर्य‘ कहने का अधिकार नहीं हैं।

भारत की सभ्यता विश्व में सर्वाधिक प्राचीन नहीं

भारत के पुराण तथा अन्य पुरातन साहित्य में स्थान-स्थान पर ऐसे उल्लेख मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि भारत में मानव सभ्यता का जन्म सृष्टि-निर्माण के लगभग साथ-साथ ही हो चुका था और धीरे-धीरे उसका विस्तार विश्व के अन्य क्षेत्रों में भीहोता रहा अर्थात भारतीय सभ्यता विश्व में सर्वाधिक प्राचीन तो है ही वह विश्वव्यापिनी भी रही है किन्तु आज का इतिहासकार इस तथ्य से सहमत नहीं है। वह तो इसे 2500 से 3000 वर्ष ई. पू. के बीच की मानता रहा है। साथ ही वह भारतीयों को घर घुस्सु और ज्ञान-विज्ञान से विहीन भी मानता रहा है किन्तु भारत मेंऔर उसकी वर्तमान सीमाओं के बाहर विभिन्न स्थानों पर हो रहे उत्खननों में मिली सामग्री के पुरातात्त्विक विज्ञान के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष उसे प्राचीन से प्राचीनतर बनाते जा रहे हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खोजों से वह 4000 ई. पू. तक पहुँ च ही चुकी थी। मोतीहारी (मध्यप्रदेश) लोथल और रंगपुर (गुजरात) बहादुराबाद और आलमगीरपुर (उत्तरप्रदेश) आदि में हुए उत्खननों में मिली सामग्रीउसे 5000 ई. पू. से पुरानी घोषित कर रही है। तिथ्यांकन की कार्बन और दूसरी प्रणालियाँ इस काल सीमाको आगे से आगे ले जा रही हैं। इस संदर्भ में बिलोचिस्तान के मेहरगढ़ तथा भारत के धौलावीरा आदि की खुराइयाँ भी उल्लेखनीय हैं, जो भारतीय सभ्यता को 10000 ई. पूर्व की सिद्ध कर रही है। गुजरात के पास खम्भात की खाड़ी में पानी के नीचे मिले नगर के अवशेष इसे 10000 ई. पू. से भी प्राचीन बताने जा रहे हैं।

दूसरी ओर प्रो. डब्ल्यु ड्रेपर के कथन के अनुसार स्काटलैण्ड में 1.40 लाख वर्ष पूर्व के प्राचीन हाथियों आदि जानवरों के अवशेषों के साथ मानव की हड्डियाँ भी मिली हैं। केन्या के संग्रहालय के डॉ.लीके ने 1.70 लाख वर्ष पूर्व विद्यमान मानव का अस्थि पिंजर खोज निकाला है। अमेरिका के येल विद्यालय के प्रो. इ. एल. साइमन्स ने ऐसे मनुष्य के जबड़े की अस्थियों का पता लगाया है जो 1.40 करोड़ वर्ष पुरानी हैं।

ईसाई धर्म के अनुसार यह भले ही माना जा रहा हो किमानव सृष्टि का निर्माण कुछ हजार वर्ष पूर्व ही हुआ है किन्तु आज की नई-नई वैज्ञानिक खोजें इस काल को लाखों-लाखों वर्ष पूर्व तक ले जा रही हैं। पाश्चात्य जगत के एक-दो नहीं, अनेक विद्वानों का मानना है कि सृष्टि का प्रथम मानव भारत में ही पैदा हुआ है कारण वहाँ की जलवायु ही मानव की उत्पत्ति के लिए सर्वाधिक अनुकूल रही है। भारतीय पुरातन साहित्य में उल्लिखित इस तथ्य की कि भारतीय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता है, पुष्टि यहाँ पुरातत्त्व विज्ञान द्वारा की जा रही है।

आदि मानव जंगली और मांसाहारी

मानव जाति का इतिहास लिखते समय आधुनिक इतिहासकारों, विशेषकर पाश्चात्यों के सामने जहाँ डार्बिन जैसे वैज्ञानिकों का मानव जीवन के विकास को दर्शाने वाले ‘विकासवाद‘ का सिद्धान्त था, जिसके अनुसार मानव का पूर्वज वनमानुष था और उसका पूर्वज बन्दर था और इस प्रकार पूर्वजों की गाथा को आगे बढ़ाकर कीड़े-मकौड़े ही नहीं एक लिजलिजी झिल्ली तक पहुँचा दिया जाता है, वहीं उनके सामने इंग्लैण्ड आदि देशों के पूर्वजों के जीवनयापन का ढंगभी था, जिसमें वे लोग जंगलों में रहते थे, पेड़ों पर सोते थे, पशुओं का शिकार करते थे और उनके मांस आदि का आहार करते थे। ऐसी स्थिति में उनके द्वारा यह मान लिया जाना अत्यन्त स्वाभाविक था कि आदि काल में मानव अत्यन्त ही अविकसित स्थिति में था। उसे न तो ठीक प्रकार से रहना आता था और न हीखाना-पीना। वह खुले आकाश के नीचे नदियों के किनारे अथवा पहाड़ों की गुफाओं में रहता था और आखेट में मारे पशु-पक्षियों के मांस से वह अपने जीवन का निर्वाह करता था। दूसरे शब्दों में इन इतिहासकारों की दृष्टि में आदि मानव जंगली और मांसाहारी था।

वस्तुतः उक्त निष्कर्ष को निकालते समय पाश्चात्य इतिहासकारों के समक्ष यूरोप के विभिन्न देशों के प्रारम्भिक मानवों के जीवन का चित्र था। जबकि मानव सृष्टि का प्रारम्भ इस क्षेत्र में हुआ ही नहीं था। आज विश्व के बड़े-बड़े विद्वान इस बात पर सहमत हो चुकेहैं कि आदि काल में मानव का सर्वप्रथम प्रादुर्भाव भारत में ही हुआ था। इस संदर्भ में फ्राँस के क्रूजर और जैकालिट, अमेरिका के डॉ. डान, इंग्लैण्ड के सर वाल्टर रेले के साथ-साथ इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड, भू-वैज्ञानिक, मेडलीकट, ब्लम्फर्ड आदि के कथन भी उल्लेखनीय हैं।

इस विषय पर प्राचीन वाङ्मय, चाहे वह भारत का हो या विदेशों का, जब अध्ययन किया जाता है तो आदि मानव के मांसाहारी होने की बात की पुष्टिनहीं हो पाती क्योंकि उसमें प्रारम्भिक मानव के भोजन के सम्बन्ध में जो तथ्य दिए गए हैं, उनसे यह बात बहुत ही स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है कि उस काल में मानव विशुद्ध निरामिष भोजी था।

प्राचीन भारतीय वाङ्मय

भारत के प्राचीन वाङ्मय में वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, पुराण, चरकसंहिता आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें इस संदर्भ में आए ब्योरे इस प्रकार हैं –

ऋग्वेद – इस वेद में यज्ञ के संदर्भ में जितने भी शब्दों का प्रयोग किया गया है, उनमें से किसी के भी अर्थ का पशुवध या हिंसा से दूर तक का भी सम्बन्ध नहीं है। प्रत्युत ‘अध्वर‘ जैसे शब्दों से अहिंसा की ध्वनि निकलती है। यज्ञों में ‘अध्वर्यू‘ की नियुक्ति अहिंसा के उद्देश्य से ही की जाती है। वह इस बात का ध्यान रखता है कि यज्ञ में कायिक, वाचिक और मानसिककिसी भी प्रकार की हिंसा न हो। यही नहीं, ऋग्वेद के मंत्र 10.87.16 में तो मांसभक्षी का सर कुचल देने की बात भी कही गई है।

यजुर्वेद – इस वेद में पशु हत्या का निषेध करते हुए उनके पालन पर जोर दिया गया है। जब उनकी हत्या ही वर्जित है तो उनको खाने के लिए कैसे स्वीकारा जा सकता है ?

अथर्ववेद – इस वेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मांसाहारी, शराबी और व्यभिचारी एक समान ही मार डालने योग्य हैं। इसी वेद के मंत्र सं. 9.6.9 में तो और भी स्पष्ट रूप में कहा गया है – ‘गाय का दूध, दही, घी खाने योग्य है मांस नहीं।‘

उक्त विवरण से स्पष्ट है कि वेदों में पशुओं को मारने और मांस खाने के लिए मना किया गया है अर्थात वैदिक आर्य लोग न तो मांस खाते थे और न ही पशुओं को मारते थे। दूसरे शब्दों में आदि कालीन मानव मांसाहारी नहीं था।

चरक संहिता – ‘चरक संहिता‘ के चिकित्सा स्थान 19.4 में लिखा हुआ है कि आदिकाल में यज्ञों में पशुओं का स्पर्श मात्र होता था। वे आलम्भ थे यानि उनका वध नहीं किया जाता था। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आदिकाल में पशुओं को मार कर खा जाना तो दूर यज्ञों में भी पशुओं का वध नहीं किया जाता था।

महाभारत के अनुशासन पर्व और मत्स्य पुराण में भी इस प्रकार के तथ्यों के उल्लेख आए हैं। ‘‘वाशिष्ट धर्मसूत्र‘‘ का अध्याय 21 भी इस दृष्टि से दर्शनीय है। इसके अनुसार उस काल में भी वृथा मांस भक्षण निषिद्ध था।

प्राचीन विदेशी वाङ्मय

यहूदी और यवन – आर्यों की भाँति ही यहूदी और यवन लोग भी कालमान में चतुर्युगी में विश्वास करते थे। उनके यहाँ प्राचीन ग्रन्थों में लिखा मिलता है कि सुवर्ण युग (सत्युग) में मनुष्य निरामिष भोजी था। पं. भगवद्दत्त ने इन संदर्भ में एक उदाहरण दियाहै जिसमें बताया गया है कि-

Among the Greaks and Semities, therefore, the idea of a Golden age and the trait that in that age man was vegetarian in his diet … (‘भारतवर्ष का बृहद इतिहास‘, भाग-1, पृष्ठ 211)

हेरोडोटस- प्रसिद्ध इतिहासकार हेरोडोटस ने अपने ग्रन्थ के भाग-1 के पृष्ठ 173 पर लिखा है कि मिस्र के पुरोहितों का यह धार्मिक सिद्धान्त था कि वे यज्ञ के अतिरिक्त किसी जीवित पशु को नहीं मारते थे। स्पष्ट है कि यज्ञ के अलावा पशु हत्या वहाँ भी नहीं होती थी।

मेगस्थनीज– मेगस्थनीज के अनुसार आदिकाल में मानव पृथ्वी से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न आहार पर निर्भर था। (फ्रेग्मेन्ट्स, पृष्ठ 34)

भारतीय और विदेशी वाङ्मय के आधार पर दिए गए उक्त विवरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आदिकालीन मानव मांसाहारी नहीं वरन निरामिष भोजी था।

वेदों का संरचना काल 1500 से 1200 ईसापूर्व तक

भारत की प्राचीन परम्परा के अनुसार वेदों के संकलन कासृष्टि निर्माण से बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध रहा है। कारण, उसका मानना है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जीने सृष्टि का निर्माण करके उसके संचालन के लिए जो विधान दिया है, वह वेद ही है। भारतीय कालगणना के अनुसार वर्तमान सृष्टि को प्रारम्भ हुए 1.97 अरब वर्ष से अधिक हो गए हैं, जबकि बाइबिल के आधारपर पाश्चात्य विद्वानों का मानना है कि वर्तमान सृष्टि को बने 6000 वर्ष से अधिक नहीं हुए हैं अर्थात इससे पूर्व कहीं भी कुछ भी नहीं था। इस संदर्भ में पाश्चात्य विद्वान एच. जी. वेल्स का ‘आउटलाइन ऑफ वर्ड हिस्ट्री (1934 ई.) के पृष्ठ 15 पर लिखा निम्नलिखित कथन उल्लेखनीय है-

‘‘केवल दो सौ वर्ष पूर्व मनुष्योत्पत्ति की आयु 6000वर्ष तक मानी जाती थी परन्तु अब पर्दा हटा है तो मनुष्य अपनी प्राचीनता लाखों वर्ष तक आंकने लगा है।‘‘

आज भारत के ही नहीं, विश्व के अनेक देशों के विद्वान यह मानने लगे हैं कि मानव सभ्यता का इतिहास लाखों-लाखों वर्ष पुराना है और वह भारतसे ही प्रारम्भ होता है। विगत दो शताब्दियों में अनेक स्थानों पर हुए भू-उत्खननों में जो पुरानी से पुरानी सामग्री मिली है, उससे भी यही स्पष्ट होता है कि मानव सभ्यता लाखों-लाखों वर्ष पुरानी है। इसकी पुष्टि स्काटलैण्ड में मिली 1.40 लाख वर्ष पुरानी और अमेरिका में मिली 2 लाख वर्ष पुरानी मानव-हड्डियाँ कर रही हैं। अन्य अनेक स्थलों पर इनसे भी और अधिक प्राचीन सामग्री मिली है। जहाँ तक भारत में ही सृष्टि के प्रारम्भ होने की बात है तो इस विषय में प्राणी शास्त्र के ज्ञाता मेडलीकट और ब्लम्फर्ड, इतिहास विषय के विद्वान थोर्टन, कर्नल टॉड और सर वाल्टर रेले, भूगर्भशास्त्री डॉ. डान (अमेरिका) तथा जेकालियट, रोम्यांरोलां, रैनेग्वानां जैसे अन्य विद्वानों का भी मानना है कि सृष्टि का प्रारम्भ भारत में ही हुआ था क्योंकि मानव के जन्म और विकास के लिए आवश्यक समशीतोषण तापमान के चिह्न प्राचीनकाल में भारत में ही मिलते हैं। इन प्रमाणों के समक्ष पाश्चात्य जगत के उन विद्वानों के निष्कर्ष, जो 17वीं से19वीं शताब्दी के बीच विश्व के विभिन्न देशों में गए हैं और जिन्हें किसी भी देश का इतिहास तीन से पाँच हजार वर्ष पूर्व से अधिक नहीं लगा, कहाँ ठहरेंगे ?

आज यह सर्वमान्य तथ्य है कि ऋग्वेद भारत का ही नहीं विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की रचना के लिए पाश्चात्य विद्वानों, यथा- मैक्समूलर, मैक्डोनल आदि ने 1500-1000 ई. पू. का काल निर्धारित किया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पाश्चात्य विद्वानों ने विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ की रचना का काल आज से मात्र 3000-3500 वर्ष पूर्वही निर्धारित किया है। यदि ऐसा है तो क्या लाखों वर्ष पूर्व से चलती आई मानव सभ्यता के पास अपना कोई लिखित साहित्य 3500 वर्ष से पूर्व था ही नहीं ? यह बात प्रामाणिक नहीं लगती, विशेषकर उस स्थिति में जबकि भारतीय कालगणना के अनुसार वर्तमान सृष्टि का निर्माण हुए एक अरब 97 करोड़ 29 लाख से अधिक वर्ष हो गए हैं और आज के वैज्ञानिकों द्वारा भी पृथ्वी की आयु 2 अरब वर्ष या इससे अधिक की निश्चित की जा रही है। यदि भारत के सृष्टि सम्वत, वैवस्वत मनु सम्वत आदि की बात छोड़ भी दें तो भी कल्याण के ‘हिन्दू संस्कृति‘ अंक के पृष्ठ 755 पर दी गई विदेशी सम्वतों की जानकारी के अनुसार चीनी सम्वत 9 करोड़ 60 लाख वर्ष से ऊपर का है, खताई सम्वत 8 करोड़ 88 लाख वर्ष से ऊपर का है, पारसी सम्वत एक लाख 89 हजार वर्ष से ऊपर का है, मिस्री सम्वत (इस सभ्यता को आज के विद्वान सर्वाधिक प्राचीन मानते हैं) 27 हजार वर्ष से ऊपर का है, तुर्की और आदम सम्वत 7-7 हजार वर्ष से ऊपर के हैं, ईरानी और यहूदी सम्वत क्रमशः 6 हजार और 5 हजार वर्ष से ऊपर के हैं। इतने दीर्घकाल में क्या किसी भी देश में कुछ भी नहीं लिखा गया?

यह ठीक है कि मैक्समूलर ने वेदों की संरचना के लिए जो काल निर्धारित किया था, उसे पाश्चात्य विद्वानों ने तो मान्यता दी ही, भारत के भी अनेक विद्वानों ने थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ उसे ही मान्यता प्रदान कर दी किन्तु ऐसे विदेशी और देशी विद्वानों की संख्या भी काफी रही है और अब निरन्तर बढ़ती जा रही है, जो 1500 ई. पू. में वेदों की रचना हुई है, ऐसा मान लेने को तैयार नहीं हैं। अलग-अलग विद्वानों ने वेदों के संकलन के लिए अलग-अलग काल निर्धारण किया है। कुछ विद्वानों का काल निर्धारण इस प्रकार है –

मेक्डोनल आदि विभिन्न पाश्चात्य विद्वान – 1200 से 1000 ई. पू.
कीथ – 1200 ई. पू.
बुहलर – 1500 ई. पू.
मैक्समूलर – 1500 ई. पू. से 1200 ई. पू.
हॉग, व्हिटने, विल्सन ग्रिफिथ, रमेशचन्द्र दत्त – 2000 ई. पू.
विंटर्निट्स – 2500 ई. पू.
शंकर बालकृष्ण दीक्षित – 3000 ई. पू.
जैकोबी – 3000-4000 ई. पू.बाल गंगाधर तिलक – 6000 से 10,000 ई. पू.
हड़प्पा की प्राचीनता के आधार पर@ – 6000 ई. पू. के आसपास
जे. एफ. जेरिग @@ – 10,000 ई. पू. से अधिक
डॉ. डेविड फ्राउले – 12,000 वर्ष से अधिक
डॉ. सम्पूर्णानन्द – 18,000 से 30,000 ई. पू.
डॉ. विष्णु श्रीधर बाकणकर@@@ – 25,000 वर्ष से अधिक
अविनाशचन्द्र दास एवं देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय – 25,000 से 50,000 ई. पू.
भारतीय पौराणिक आधार पर – सृष्टि निर्माण के प्रारम्भिक काल में

@ नवीनतम शोधों के अनुसार 3500 ई. पू. से आगे की मानी जा रही है

@@बिलोचिस्तान में बोलन दर्रे के निकट मेहरगढ़ की खुदाई में मिली सामग्री के लिए दी गई 7500-8000 ई. पू. की तिथि के आधार पर

@@@सरस्वती-नदी के आधार पर जिसके किनारों पर वेदों कासंकलन हुआ था।

इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जैसे-जैसे नए-नए पुरातात्त्विक उत्खनन होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे भारतीय सभ्यता प्राचीन से प्राचीनतर सिद्ध होती जा रही है और वैसे-वैसे ही विश्व के सर्वप्रथम लिखित ग्रन्थ वेद की प्राचीनता भी बढ़ती जा रही है क्योंकि यह भारत का सर्वप्रथम ग्रन्थ है।

भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियों की हेरा-फेरी

भारतीय इतिहास का आधुनिक रूप में लेखन करने वाले पाश्चात्य विद्वानों ने इतिहास लिखते समय भारतीय वाङ्मय के स्थान पर भारत के सम्बन्ध में विदेशियों द्वारा लिखे गए ग्रन्थों को मुख्य रूप में आधार बनाया है। ऐसा करके उन्होंने अपने लेखन के क्षेत्र के आधार को सीमित करके उसे एकांगी बना लिया। भारतीय ग्रन्थों को उन्होंने या तो पढ़ा ही नहीं, यदि पढ़ा भी तो उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया और गहराई में जाए बिना ही उन्हें अप्रामाणिकता की कोटि में डाल दिया। इसी कारण भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियों में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ पैदा हो गईं। उन भ्रान्तियों के निराकरण के लिए अर्थात अपने असत्य को सत्य सिद्ध करने के लिए उन लोगों को जबरन नई-नई और विचित्र कल्पनाएँ करनी पड़ीं, जो स्थिति का सही तौर पर निदान प्रस्तुत करने के स्थान पर उसे और अधिक उलझाने में ही सहायक हुईं।

भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियाँ– भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियों में अशुद्धता, मुख्यतः विंटर्निट्ज जैसे पाश्चात्य लेखकों केस्पष्ट रूप में यह मान लेने पर कि भारत के इतिहास के संदर्भ में भारतीयों द्वारा बताई गईं तिथियों की तुलना में चीनियों द्वारा बताई गई तिथियाँ आश्चर्यजनक रूप से उपयुक्त एवं विश्वसनीय है, अर्थात भारतीय आधारों का निरादर करके उनके स्थान पर चीन, यूनान, आदि देशों के लेखकों द्वारा भारत के संदर्भ में लिखे गए ग्रन्थों में उल्लिखित अप्रामाणिक तिथियों के अपनाने से आई हैं। इसी कारण जोन्स आदि को भारत के ऐतिहासिक तिथिक्रम में ऐसी कोई तिथि नहीं मिली, जिसके आधार पर वे भारत के प्राचीनइतिहास के तिथिक्रम का निर्धारण कर पाते। यह आश्चर्य की बात ही है कि भारतीय पुराणों में उल्लिखित एक ठोस तिथिक्रम के होते हुए भी जोन्स ने यूनानी साहित्य के आधार पर 327 ई. पू. में सेंड्रोकोट्टस के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य को जीवित मानकर 320 ई. पू. में उसके राज्यारोहण की कल्पना कर डाली और इसी तिथि को आधार बनाकर भारत का एक ऐसा पूरा ऐतिहासिक तिथिक्रम निर्धारित कर दिया जो कि भारतीय स्रोतों के आधार पर कहीं टिक ही नहीं पाता। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि एक देश विशेष का इतिहास लिखते समय विदेशी साहित्य का सहयोग लेना तो उचित माना जा सकता है किन्तु उसके आधार पर उस देश का ऐतिहासिक तिथिक्रम तैयार करना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। 320 ई. पू. के आधार पर भारत के ऐतिहासिक तिथिक्रम का निर्धारण करके और वह भी भारतीय स्रोतों को न केवल नकार कर वरन उसे कपोल-कल्पित तथा अप्रामाणिक बताकर पाश्चात्य लेखकों ने भारत की भावी संतति के साथ अन्याय ही नहीं किया, वरन विश्वासघात भी किया है।

विदेशी आधारों पर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भारतीयइतिहास की घटनाओं की जो तिथियाँ निर्धारित की गईं, उनकी पुष्टि किसी भी भारतीय स्रोत के आधार पर नहीं हो पाती। कुछ महत्त्वपूर्ण तिथियाँ इस प्रकार हैं –

  • भारतीय इतिहास अधिक से अधिक 3000-2500 ई. पू. से प्रारम्भ होता है।
  • वेदों की रचना 1500 से 1000 ई. पू. के बीच में हुई थी।
  • महाभारत अधिक से अधिक 800 ई. पू. में हुआ था।
  • स्मृतियों का रचनाक्रम अधिक से अधिक 200 ई. पू. में प्रारम्भ हुआ था।

आज की तथाकथित शुद्ध ऐतिहासिक परम्परा में यदि किसीघटना से सम्बंधित तिथि ही गलत हो तो अन्य विवरणों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। जबकि भारत के इतिहास में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा एक-दो नहीं अनेक स्थानों पर ऐसा किया गया है। ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने से ही नहीं उनके अशुद्ध काल-निर्धारण करने के कारण भी अनेक स्थानों पर घटनाओं की श्रृंखलाएँ टूट गई हैं। टूटी हुई श्रृंखलाओं को मिलाने के लिए आधुनिक इतिहासकारों को बे-सिर-पैर की विचित्र-विचित्र कल्पनाएँ करनी पड़ीं, जिससे स्थिति बड़ी ही हास्यास्पद बन गई, यथा- भारतीय इतिहास के कई लेखकों को भिन्न-भिन्न कालों में हुए दो-दो और कई कोतीन-तीन कालीदासों की कल्पना करनी पड़़ी है। इसी प्रकार से कई विद्वानों को दो-दो भास्कराचार्य ही नहीं प्रभाकर भी दो-दो मानने पड़े हैं। श्री चन्द्रकान्त बाली ने तो एक शूद्रक की जगह तीन-तीन शूद्रक बना दिएहैं (सरस्वती, मई 1973)। स्व. बालकृष्ण दीक्षित ने अपने ग्रन्थ ‘भारतीय ज्योतिष‘ के पृष्ठ 294पर दो बराहमिहिर हुए माने हैं। यही नहीं, कुछ विद्वानों ने शौनक ऋषि के समकालीन आश्वलायन को बुद्धका समकालीन आस्सलायन बता दिया है। इसी प्रकार प्रद्योत वंश के संस्थापक को अवन्ती का चण्ड प्रद्योत समझ लिया है। ऐसी कल्पनाओं के फलस्वरूप भारतीय इतिहास में विद्यमान भ्रान्तियों की लम्बी सूची दी जा सकती है। ये भ्रान्तियाँ इस बात की स्पष्ट प्रमाण हैं कि अशुद्ध और अप्रामाणिक तिथियों के आधार पर लिखा गया किसी देश का इतिहास कितनी मात्रा में विकृत हो जाता है।

साहित्यिक

भारत में ऐतिहासिक सामग्री का अभाव

भारतीय दृष्टि से इतिहास एक विद्या विशेष है। विद्या केरूप में इतिहास का उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में किया गया है। अथर्ववेद सृष्टि निर्माता ब्रह्मा जी की देन है, ऐसा माना जाता है। अतः भारत में ऐतिहासिक सामग्री की प्राचीनता असंदिग्ध है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि भारत में ऐतिहासिक सामग्री का अभाव था, वास्तविकता को जानबूझकर नकारने के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। व्यास शिष्य लोमहर्षण के अनुसार प्रत्येक राजा को अपने समय का काफी बड़ा भाग इतिहास के अध्ययन में लगाना चाहिए और राजमंत्री को तो इतिहास तत्त्व का विद्वान होना ही चाहिए। राजा के लिए प्रतिदिन इतिहास सुनना एक अनिवार्य कार्य था। यदि प्राचीन काल में ऐतिहासिक सामग्री नहीं थी तो वे लोग क्या सुनते थे?

भारत के इतिहास का आधुनिक रूप में लेखन करते समय मुख्य बात तो यह रही कि सत्ताधारी और उनके समर्थक इतिहासकार भारत की प्राचीन सामग्री को सही रूप से प्रकाश में लाना ही नहीं चाहते थे। इसीलिए उसको प्रकाश में लाने के लिए जितने श्रम और लगन से खोज करने की आवश्यकता थी, वह नहीं की गई। इस संदर्भ में कर्नल टॉड का ‘राजस्थान‘ नामक ग्रन्थ की भूमिका में यह कहना सर्वथा उपयुक्त लगता है कि-

जब सर विलियम जोन्स ने संस्कृत साहित्य की खोज शुरू की तो बड़ी आशा बंधी थी कि इससे संसार के इतिहास को बहुत कुछ प्राप्त होगा किन्तु वह आशा अब तक पूर्ण नहीं हुई। इससे उत्साह के स्थान पर निराशा और उदासीनता व्याप्त हो गई। सभी मानने लगे कि भारतवर्ष का कोई जातीय इतिहास है ही नहीं। इसके उत्तर में एक फ्रान्सीसी ओरिएन्टलिस्ट के कथन को रख सकते हैं जिसने बड़ी चतुराई से पूछा कि ‘अबुलफजल‘ ने हिन्दुओं के प्राचीन इतिहास के लिए सामग्री कहाँ से प्राप्त की थी ?
वास्तव में विल्सन ने कश्मीर के ‘राजतरंगिणी‘ नामक इतिहास का अनुवाद करते समय इस अविचार को बहुत कुछ घटाया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि इतिहास लिखने की नियमबद्ध परिपार्टी भारतवर्ष में अविदित नहीं थी और ऐसा निश्चित करनेके लिए सन्तोषजनक प्रमाण मिलते हैं कि किसी समय में इतिहास की पुस्तकें वर्तमान समय की अपेक्षा अधिक मात्रा में उपलब्ध थीं …।

जहाँ तक भारत में ऐतिहासिक ग्रन्थों का प्रश्न है, इस दृष्टि से निराशा की इतनी बात नहीं है, जितनी कि पाश्चात्य इतिहासकारों ने दर्शाई है। मूल ऐतिहासिक ग्रन्थों के अभाव के इस युग में भी एक दो नहीं अनेक ऐसे ग्रन्थ उपलब्ध हैं, जिनमें बड़ी मात्रा में भारत की ऐतिहासिक सामग्री सुलभ है। मुख्य प्रश्न तो संस्कृत आदि भाषाओं के ग्रन्थों में इतस्ततः बिखरी सामग्री को खोजकर निकालने और उसे सही परिप्रेक्ष्य में तथा उचित ढंग से सामने लाने का था, जो कि सही रूप में नहीं किया गया।

संस्कृत वाङ्मय

संस्कृत वाङ्मय में से वैदिक और ललित साहित्य के कुछ ऐसे ग्रन्थों के नामों के साथ ज्योतिष, आयुर्वेद तथा व्याकरण के कुछ ग्रन्थों का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है, जिनमें महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उल्लेख सुलभ हैं।

वैदिक साहित्य – विभिन्न संहिताओं, उपसद्, ऐतरेय, जैमनीय, गोपथ, शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों, विभिन्न आरण्यकों, उपनिषदों, वेदांग साहित्य, कल्पसूत्र, ग्रह्य सूत्र, स्मृति ग्रन्थों आदि में महाभारत काल से लाखों-लाखों वर्ष पूर्व की प्राचीन ऐतिहासिक घटनाएँ यथा- इन्द्र द्वारा किए गए विभिन्न युद्धों के वर्णन, इन्द्र-त्वष्टा संघर्ष, विश्वामित्र-वसिष्ठ की शत्रुता, इन्द्र द्वारा नहुष और दिवोदास को बल प्रदान करने जैसी विविध कथाएँ तथा अन्य विविध ऐतिहासिक सामग्री सुलभ है।

ललित साहित्य – महाकाव्य/काव्य ग्रन्थों, यथा- विभिन्न रामायणों, महाभारत, रघुवंश, जानकीहरण, शिशुपाल वध, दशावतार चरित आदि, विभिन्न ऐतिहासिक नाटकों, यथा- अमृतमन्थन समवकार, लक्ष्मी स्वयंवर, वैणीसंहार, स्वप्नवासवदत्ता आदि, विविध कथा ग्रन्थों, यथा- बन्धुमति, भैमरथी, सुमनोत्तरा, बृहदकथा, शूद्रककथा, तरंगवती, त्रैलोक्यसुन्दरी, चारुमति, मनोवती, विलासमती, अवन्तिसुन्दरी, कादम्बरी आदि के साथ क्षेमेन्द्र की बृहदकथामंजरी, सोमदेव का कथासरित्सागर तथा चरित ग्रन्थों, यथा- प्राचीन काल के पुरुरवा चरित, ययाति चरित, देवर्षि चरित और बाद के बुद्ध चरित, शूद्रक चरित, साहसांकचरित, हर्षचरित, विक्रमांकचरित, पृथ्वीराज रासो आदि में पर्याप्त मात्रा में ऐतिहासिक सामग्री सुलभ है।

ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ग्रन्थ – कश्यप, वशिष्ठ, पराशर, देवल आदि तथा इनसे पूर्व के ज्योतिष से सम्बंधित विद्वानों की रचनाएँ ऐतिहासिक काल निर्धारण के संदर्भ में बड़े महत्व की हैं। गर्ग संहिता, चरक संहिता में भी अनेक ऐतिहासिक सूत्र विद्यमान हैं।

अर्थ शास्त्र – कौटिल्य के ‘अर्थ शास्त्र‘ में चार स्थानों पर, यथा- अध्याय 6, 13, 20 और 95 में प्राचीन आर्य राजाओं के संदर्भ में बहुत सी उपयोगी बातें लिखी हैं जिनसे भारत के प्राचीन इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

व्याकरण ग्रन्थ – ये ग्रन्थ केवल भाषा निर्माण के सिद्धान्तों तक ही सीमित नहीं रहे हैं, उनमें तत्कालीन ही नहीं, उससे पूर्व के समय के भी धर्म, दर्शन, राजनीति शास्त्र, राजनीतिक संस्थाओं आदि के ऐतिहासिक विकास पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है, जिससेवे इतिहास विषय पर लेखन करने वालों के लिए परम उपयोगी बन गए हैं। पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी‘, पतंजलि का महाभाष्य इस दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ हैं। उत्तरवर्ती वैयाकरणों में ‘चान्द्रव्याकरण‘ और पं. युधिष्ठिर मीमांसक का ‘संस्कृत व्याकरण-शास्त्र का इतिहास‘, भी इस दृष्टि से उल्लेखनीयहै।

उक्त वैदिक और ललित साहित्य तथा ज्योतिष, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, व्याकरण आदि के ग्रन्थों के अलावा भी संस्कृत भाषा के बहुत से उल्लेखनीय ग्रन्थ हमारे यहाँ आज भी इतनी बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं कि उन सबका ब्योरा यहाँ दे पाना कठिन ही नहीं, असंभवहै।

ऐतिहासिक ग्रन्थ

(अ) राजतरंगिणी – कश्मीरी कवि कल्हण कृत ‘राजतरंगिणी‘ में कश्मीर के राजवंशों का इतिहास दिया गया है। इसकी रचना 1148 ई. में हुई थी। विल्सन, स्मिथ आदि कई पाश्चात्य लेखकों ने भी इस पुस्तक में वर्णित विषय की बड़ी प्रशंसा की है।

‘राजतरंगिणी‘ में कश्मीर राज्य का इतिहास महाभारत युद्ध (3138 ई.पू.) से 312 वर्ष पूर्व से दिया गया है। इसमें 3450 ई. पू. से 1148 ई. (‘राजतरंगिणी‘ के रचनाकाल) तक का इतिहास सुलभ है। इसमें उल्लिखित विवरणों से भारत के प्राचीन इतिहास की अनेक घटनाओं और व्यक्तियों पर काफी प्रकाश पड़ता है। पं. कोटावेंकटचलम ने ‘क्रोनोलोजी ऑफ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सटक्टेड‘ में बताया है कि इसमें महाभारत से पूर्व हुए मथुरा के श्रीकृष्ण-जरासंघ युद्ध, महाभारत-युद्ध और महाभारत के बाद की कश्मीर की ही नहीं भारत की विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं, यथा- परीक्षितकी कश्मीर विजय, परीक्षित की मृत्यु, गौतम बुद्ध की मृत्यु, कनिष्क का राज्यारोहण आदि का उल्लेख भी मिलता है। ‘राजतरंगिणी‘ में दिए गए अनेक ब्योरों की पुष्टि भारतीय पुराणों में उल्लिखित ब्योरों सेहो जाती है, किन्तु भारत के इतिहास-लेखन में इस पुस्तक का कोई भी सहयोग नहीं लिया गया। उलटे फ्लीट आदि के द्वारा इसमें उल्लिखित तथ्यों को हर प्रकार से अप्रामाणिक सिद्ध करने का प्रयास किया गया।

(आ) नेपाल राजवंशावली– नेपाल की राजवंशावली में वहाँ के राजाओं का लगभग 5 हजार वर्षों का ब्योरा सुलभ है। पं. कोटावेंकटचलम ने इसवंशावली पर काफी कार्य किया है और उन्होंने मगध, कश्मीर तथा नेपाल राज्यों के विभिन्न राजवंशों के क्रमानुसार राजाओं का पूरा ब्योरा ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘ के परिशिष्ट – 1 (पृ. 89 से 100) में दिया है। इसमें नेपाल के 104 राजाओं के 4957 वर्षों के राज्यकाल की जो सूची दी गई है, उसमें कलियुग के 3899वर्षों के साथ-साथ द्वापर के अन्तिम 1058 वर्षों का ब्योरा भी दिया गया है। इस वंशावली से भारतीय इतिहास के भी कई अस्पष्ट पन्नों, यथा- आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी के जन्म और विक्रम सम्वत के प्रवर्तक उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य के ऐतिहासिक व्यक्तित्व होने जैसे विषयों, को स्पष्ट करने में सहयोग मिल जाता है।

बौद्ध साहित्य

बौद्धों का सबसे प्राचीन ग्रन्थ त्रिपिटक है। इसमें तीन पिटक, यथा- सुत्त, विनय और अभिधम्म हैं। इनसे उस समय के भारत के सामाजिक और धार्मिक जीवन पर बहुत प्रकाश पड़ता है। इनके अतिरिक्त विभिन्न राजाओं के समय में अनेक लेखकों द्वारा भी तरह-तरह के ग्रन्थों की रचना की गई, जिनमें तत्कालीन स्थिति का निरूपण व्यापक स्तर पर किया गया है। बौद्ध ग्रन्थ महाबग्ग, महापरिनिब्बान सुत्त, दिग्ध निकाय, निरयावली सुत्त, पेतवत्थु अट्ठकथा, सुमंगल विलासनी संयुत्त निकाय, विप्रा निकाय, सुत्त निपात, विमानवत्थु अट्ठकथा, थेरीगाथा, धम्मपदअट्ठकथा, मंझिम निकाय, अंगुत्तर निकाय आदि ग्रन्थों में बिम्बिसार, अजातशत्रु, दर्शक, उदायि आदि राजाओं के सम्बन्ध में बड़ी जानकारी है। ‘मिलिन्द पन्ह‘ में यूनानी राजा मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन की जीवनी है। इसमें ईसा पूर्व पहली दो शताब्दियों के उत्तर-पश्चिमी भारत के जन-जीवन की झांकी मिलती है। ‘दिव्यावदान‘ में अनेक राजाओं की कथाएँ हैं। ‘मंजुश्रीमूलकल्प‘ भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय ग्रन्थ है।

जैन साहित्य

बौद्ध साहित्य की तुलना में जैन साहित्य ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक सशक्त है। यह सही है कि जैन साहित्य का संकलन काफी समय बाद में शुरू किया गया था। फिर भी अनेक राजाओं से सम्बंधित घटनाएँ, सम्वत तथा विभिन्न ऐतिहासिक घटनाएँ जैन साहित्य में विस्तार से मिलती हैं। इस दृष्टि से ‘उत्तराध्ययन‘ नामक ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं। विक्रम की चौथी और पाँचवीं शताब्दियों से लेकर नौवीं-दसवीं शताब्दियों तक जैनाचार्य जिनसेन, हरिभद्रसूरी, हेमचन्द्र आदि विद्वानों ने जैन मत की टूटी हुई प्राचीन परम्परा को पुनः जोड़ा और इतिहास का संग्रह किया। जैन रचनाओं के आधार पर भी प्राचीन भारत के इतिहास के अनेक टूटे हुए सूत्र जोड़े जा सकते हैं। इस दृष्टि से ई. पू. छठी शतादी में आचार्य यतिवृषभ द्वारा लिखित ग्रन्थ ‘तिलोयपण्णत्ति‘ सहित समय-समय पर लिखित अन्य अनेक ग्रन्थ, यथा- ‘उपासमदसाओं‘, ‘राजावलिकथा‘, ‘विविध तीर्थ कल्प‘, ‘जम्बुद्वीप प्रज्ञप्ति‘, ‘बृहत् कल्पसूत्र‘, ‘निर्युक्ति गाथा‘, ‘ज्ञाताधर्म कथा‘, ‘ओमवार्तिक सूत्र‘, ‘निशीथचूर्णि‘ आदि उल्लेखनीय है।

अन्य क्षेत्रीय ग्रन्थ

सम्राट हर्षवर्धन के पश्चात देश में केन्द्रीय सत्ता समाप्त हो जाने पर देश छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। पंजाब, हिमाचल, गुजरात, राजस्थान आदि क्षेत्रों में स्थापित स्वतंत्र राज्यों में अपने-अपने राज्यानुसार ऐतिहासिक विवरण तैयार कराए गए। इन राज्यों में मिले कई विवरण प्राचीन इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। पंजाब और हिमाचल राज्यों में मिली राजवंशावलियोंमें कई प्राचीन ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं।

इसी प्रकार से गुजरात के राजवंशों के सम्बन्ध में भीकई ऐतिहासिक ग्रन्थ सुलभ हो चुके हैं। राजस्थान के विभिन्न राजवंशों के संदर्भ में वहाँ के ही राजकीय संग्रहालयों में अनेक रचनाएँ विद्यमान हैं जिनके संदर्भ में कर्नल टॉड ने अपने ग्रन्थ ‘राजस्थान‘ में संकेत दिए हैं।

इतनी सामग्री के होते हुए भी भारत में ऐतिहासिक सामग्री के अभाव की बात करनी कहाँ तक न्यायसंगत है, यह विचारणीय है।

भारत का प्राचीन साहित्य, यथा- रामायण, महाभारत, पुराण आदि ‘मिथ’

भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व सभी भारतीयों को अपने प्राचीन साहित्य में, चाहे वह रामायण हो या महाभारत, पुराण हो या अन्य ग्रन्थ, पूर्ण निष्ठा थी। इसके संदर्भ में ‘मिथ‘ की मिथ्या धारणा अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा ही फैलाई गई क्योंकि अपने उद्देश्य की प्राप्ति की दृष्टि से उनके लिए ऐसा करना एक अनिवार्यता थी। बिना ऐसा किए इन ग्रन्थों में उल्लिखित ऐतिहासिक तथ्यों की सच्चाई से बच पाना उनके लिए कठिन था। जबकि भारतीय ग्रन्थ यथा- रामायण, महाभारत, पुराण आदि भारत के सच्चे इतिहास के दर्पण हैं। इनके तथ्यों को यदि मान लिया जाता तो अंग्रेज लोग भारत के इतिहास-लेखन में मनमानी कर ही नहीं सकते थे। अपनी मनमानी करने के लिएही उन लोगों ने भारत के प्राचीन ग्रन्थों के लिए ‘मिथ‘, ‘अप्रामाणिक‘, ‘अतिरंजित‘, ‘अविश्वसनीय‘ जैसे शब्दों का न केवल प्रयोग ही किया वरन अपने अनर्गल वर्णनों को हर स्तर पर मान्यता भी दी और दिलवाई। फलतः आज भारत के ही अनेक विद्वान उक्त ग्रन्थों के लिए ऐसी ही भावना रखने लगे जबकि ये सभी ग्रन्थ ऐतिहासिक तथ्यों से परिपूर्ण हैं।

रामायण

वाल्मीकि ने श्रीराम की कथा के माध्यम से उनसे पूर्व के लाखों-लाखों वर्षों के भारत के इतिहास को सामने रखते हुए भारत के स्वर्णिम अतीतका ज्ञान बड़े ही व्यापक रूप में वर्णित किया है। रामायण की कथा की ऐतिहासिकता के संदर्भ में महर्षिव्यास का महाभारत में यह कथन सबसे बड़ा प्रमाण है, जो उन्होंने वन पर्व में श्रीराम की कथा का उल्लेखकरते हुए कहा है – ‘राजन ! पुरातन काल के इतिहास में जो कुछ घटित हुआ है अब वह सुनो‘। यहाँ‘पुरातन‘ और ‘इतिहास‘, दोनों ही शब्द रामायण की कथा की प्राचीनता और ऐतिहासिकता प्रकट कर रहे हैं। यही नहीं, श्रीराम की कथा की ऐतिहासिकता का सबसे प्रबल आधुनिक युग का वैज्ञानिक प्रमाण अमेरिकाकी ‘नासा‘ संस्था द्वारा 1966 में और भारत द्वारा 1992 में छोड़े गए अन्तरिक्ष उपग्रहों ने श्रीराम द्वारा लंका जाने के लिए निर्मित कराए गए सेतु के समुद्र में डूबे हुए अवशेषों के चित्र खींचकर प्रस्तुतकर दिया है।

इस कथा की ऐतिहासिकता का ज्ञान इस बात से भी हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड के नवम् सर्ग के श्लोक 5 में बताया गया है कि जब हनुमान जी सीता जी की खोज के लिए लंका में रावण के भवन के पास से निकले तो उन्होंने वहाँतीन और चार दाँतों वाले हाथी देखे। श्री पी. एन. ओक के अनुसार आधुनिक प्राणी शास्त्रियों का मानना है कि ऐसे हाथी पृथ्वी पर थे तो अवश्य किन्तु उनकी नस्ल को समाप्त हुए 10 लाख वर्ष से अधिक समय हो गया। दूसरे शब्दों में श्रीराम की कथा दस लाख वर्ष से अधिक प्राचीन तो है ही साथ ही ऐतिहासिक भी है।

महाभारत

यह महर्षि वेदव्यास की महाभारत युद्ध के तुरन्त बाद ही लिखी गई एक कालजयी कृति है। इसे उनकी ही आज्ञा से सर्पसत्र के समय उनके शिष्य वैषम्पायन ने राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय को सुनाया था, जिसका राज्यकाल कलि की प्रथम शताब्दी में रहा था अर्थात इसकी रचना को 5000 साल बीत गए हैं। यद्यपि इसकी कथा में एक परिवार के परस्पर संघर्ष का उल्लेख किया गया है परन्तु उसकी चपेट में सम्पूर्ण भारत ही नहीं अन्य अनेक देश भी आए हैं। फिर भी सारी कथा श्रीकृष्ण के चारों ओर ही घूमती रही है। यह ठीक है कि आज अनेकलेखक श्रीकृष्ण के भू-अवतरण को काल्पनिक मान रहे हैं किन्तु वे भारत के एक ऐतिहासिक पुरुष हैं, इसका प्रमाण भारत का साहित्य ही नहीं आधुनिक विज्ञान भी प्रस्तुत कर रहा है।

समुद्र में तेल खोजते समय भारतीय अन्वेषकों को 5000 वर्ष पूर्व समुद्र में डुबी श्रीकृष्ण जी की द्वारिका के कुछ अवशेष दीखे। खोज हुई और खोज में वहाँ मिली सामग्री के संदर्भ में 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री द्वारा लोकसभा में दिए गएएक प्रश्न के उत्तर में बताया गया था कि वहाँ मिली सामग्री में 3 छिद्रित लंगर, मोहरें, उत्कीर्णित जार, मिट्टी के बर्तन, फ्लेग पोस्ट के साथ-साथ एक जेटी (घाट) आदि उल्लेखनीय हैं। महाभारत युद्ध का कालभारतीय पौराणिक कालगणना के अनुसार आज से 5144-45 वर्ष पूर्व का है। द्वारिका की खोज ने भारतीय पुरातन साहित्य में उल्लिखित श्रीकृष्ण और द्वारिका के साथ-साथ महाभारत की कथा को ‘मिथ‘ की कोटि से निकाल कर इसे इतिहास भी सिद्ध कर दिया है।

पुराण

पुराण भारतीय जन-जीवन के ज्ञान के प्राचीनतम स्रोतों में से हैं। इन्हें भारतीय समाज में पूर्ण सम्मान दिया जाता रहा है। पुराणों को श्रुति अर्थात वेदों के समान महत्त्व दिया गया है – ‘‘श्रुति-स्मृति उभेनेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम्‘‘ अर्थातश्रुति और स्मृति दोनों ही नेत्र हैं तथा पुराण हृदय। मनुस्मृति में श्राद्ध के अवसर पर पितरों को वेद और धर्मशास्त्र के साथ-साथ इतिहास और पुराणों को सुनाने के लिए कहा गया है। पुराणों की कथाओं का विस्तार आज से करोड़ों-करोड़ों वर्ष पूर्व तक माना जाता है। इनके अनुसार सृष्टि का निर्माण आज से 197 करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व हुआ था। पहले इस बात को कपोल-कल्पित कहकर टाला जाता रहा है किन्तु आज तोविज्ञान भी यह बात स्पष्ट रूप में कह रहा है कि पृथ्वी का निर्माण दो अरब वर्ष से अधिक पूर्व में हुआ था। दूसरे शब्दों में पुराणों में कही गई बात विज्ञान की कसौटी पर सही पाई गई है। अतः इनकी प्रामाणिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है। पुराणों से सृष्टि रचना, प्राणी की उत्पत्ति, भारतीय समाज के पूर्व पुरुषों के कार्य की दिशा, प्रयास और मन्तव्य के ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न मानव जातियों की उत्पत्ति, ज्ञान-विज्ञान, जगत के भिन्न-भिन्न विभागों के पृथक-पृथक नियमों आदि का भी पता चलता है। इनमें देवताओं और पितरों की नामावली के साथ-साथ अयोध्या, हस्तिनापुर आदि के राजवंशों का महाभारत युद्ध के 1504 वर्ष के बाद तक का वर्णन मिलता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि पुराणों की रचना महाभारत के 1500 वर्षों के बाद हुई है। विभिन्न भारतीय विद्वानों का कहना है कि पुराण तो प्राचीन हैं किन्तु उनमें राजवंशों के प्रकरण समय-समय पर संशोधित किए जाते रहे हैं। यही कारण है कि अलग-अलग पुराणों में एक ही वंश के राजाओं की संख्या में अन्तर मिल जाता है, क्योंकि यह वंश के प्रसिद्ध राजाओं की नामावली है वंशावली नहीं। उदाहरण के लिए- सूर्यवंश के राजाओं की संख्याविष्णु पुराण में 92, भविष्य में 91, भागवत में 87 और वायु में 82 दी गई है। लगता है संशोधनों केही समय इनमें कुछ बातें ऐसी भी समाविष्ट हो गई हैं जिनके कारण इनकी कुछ बातों की सत्यता पर ऊँगली उठा दी जाती है।

राजाओं और राजवंशों के वर्णन अतिरंजित एवं अवास्तविक

महाभारत युद्ध के 200-250 वर्ष के पश्चात ही भारत की केन्द्रीय सत्ता हस्तिनापुर से निकल कर मगध राज्य में चली गई और मगध की गद्दी पर एक के पश्चात दूसरे वंश का अधिकार होता चला गया। इन सभी वंशों के राजाओं की सूचियाँ ‘वायु‘, ‘ब्रह्माण्ड‘, ‘मत्स्य‘, ‘विष्णु‘, ‘श्रीमद्भागवत्‘ आदि पुराणों में मिलती हैं। साथ ही ‘कलियुग राज वृत्तान्त‘ और ‘अवन्तिसुन्दरीकथा‘ में भी इन राजवंशावलियों का उल्लेख किया गया है। इन सभी ग्रन्थों में वर्णित राजाओं के नामों तथा उनकी आयु और राज्यकालों में कहीं-कहीं परस्पर अन्तर मिलता है किन्तु यह अन्तर ऐसा नहीं है जिसेठीक न किया जा सके। जबकि जोन्स आदि ने उनके सम्बन्ध में पूर्ण विवेचन किए बिना ही निम्नलिखित कारणों से उन्हें अतिरंजित, अविश्वसनीय और अवास्तविक कहकर नकार दिया-

  • सभी राजवंशों का अन्त लगभग समान रूप से हुआ है।
  • एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं।
  • राजाओं की आयु और राजवंशों की राज्यावधि बहुतअधिक दिखाई गई है।

सभी राजवंशों का अन्त लगभग समान रूप में हुआ है

महाभारत के बाद मगध के प्रथम राजवंश बार्हद्रथ के पुत्र-विहीन अन्तिम नरेश रिपुंजय जो 50 वर्ष तक अशक्त रहकर राज्य चलाता रहा था, को उसके मंत्री ने मारकर राजगद्दी अपने पुत्र को दे दी। दूसरे राजवंश प्रद्योत के अन्तिम राजा नन्दिवर्धन को काशी के नरेश शिशुनाग ने मारकर गद्दी हथिया ली। नन्दवंश के अन्तिम राजा को चाणक्य ने मरवाकर चन्द्रगुप्त मौर्य को गद्दी दिला दी। मौर्य वंश के अन्तिम सम्राट वृहद्रथ जो 87 वर्ष तक राज्य करते रहने के कारण अत्यन्त अशक्त, दुर्बल और अकुशल हो चुका था, को उसके सेनापति पुष्यमित्र ने मारकर गद्दी पर अधिकार कर लिया। पुष्यमित्र के वंश के श्रीविहीन अन्तिम राजा देवभूति को उसके मंत्री ने मारकर कण्व वंश का शासन स्थापित किया। इस वंश केअन्तिम राजा सुशर्मा को उसके सेवक श्रीमुख ने मारकर राज्य संभाल लिया। आन्ध्र वंश के अन्तिम राजा चन्द्रश्री को और बाद में उसके पुत्र को मारकर आन्ध्रभृत्य वंश अर्थात गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त प्रथमने सत्ता संभाल ली। इसमें सन्देह नहीं कि उक्त सभी राजवंशों का अन्त अन्तिम राजा को मारकर ही किया गया है किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं हो सकता कि ये सब वृत्त झूठे हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि एक दो को छोड़कर अधिकांश राजाओं की मृत्यु का कारण उनकी दुर्बलता और निष्क्रियता रहा है, जो कि राजाओं के लिए विनाशकारी होती ही है।

एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं

एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं- भारत के प्राचीन राजवंशों के कई राजाओं के नाम अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग मिलते हैं। इससे सन्देह होता है सही नाम कौन सा है और वह व्यक्ति हुआ भी है या नहीं। नामों में अन्तर कई कारणों से हुआ है, यथा-

(1) भिन्न-भिन्न पुराणों की प्रतिलिपियाँ तैयार करतेसमय अनजाने में ही नामों के अक्षर आगे-पीछे हो गए हैं या कहीं-कहीं ग्रन्थ की प्रति अधिक प्राचीन होने से लिखावट पढ़ पाने में कठिनाई के कारण अथवा कहीं-कहीं ध्वनि साम्य के कारण भी नामों के अक्षरों में अन्तर आ गया है, जैसे- सोमाधि और सोमापि, अयुतायु और अयुनायु, सूर्यक और सुबक या अजक या जनक, दर्भक और दर्शक, उदयन और उदायी आदि।
(2) कहीं-कहीं स्मृति-भेद के कारण भी नाम अलग-अलग हो गए हैं, जैसे- द्रुर्हसेन का द्रुदसेन या दृढ़सेन, उदयन का उदयाश्व या उदायी, आदि।
(3) नामों के अन्तर का एक कारण विभिन्न पुराणों का वर्णन कविता में होना भी है। कविता में छन्द, अलंकार, शब्द, मात्रा, वर्ण आदि के बन्धनों के कारण व्यक्तियों तथा स्थानों के नाम के खण्डों की मात्राओं और अक्षरों को आगे-पीछे कर दिया गया है और कहीं-कहीं समानार्थक शब्दों का प्रयोग भी कर दिया गया है, यथा- महाबल और महाबाहु, रिपुंजय और शत्रुंजय आदि।

राजाओं की आयु और राजवंशों की राज्यावधि बहुत अधिक दिखाई गई है

इस संदर्भ में सबसे मुख्य बात तो यह है कि उस समय सामान्य लोगों कीआयु ही अधिक होती थी। फिर राजाओं की, जिन्हें सब प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं, अधिक आयुहोना अस्वाभाविक नहीं था। वैसे जितना ज्यादा शोर आयु और शासनकाल की अधिकता का मचाया गया है उतना है कुछ नहीं। बार्हद्रथ वंश से आन्ध्रवंश तक 8 वंशों के 97 राजाओं की कुल राज्यावधि 2811 वर्षके हिसाब से प्रति राजा के शासन की औसत 29 वर्ष बनती है। इनमें से 50 या अधिक वर्षों तक राज्य करने वाले केवल 17 राजा हुए हैं, जिनमें से 10 तो अकेले बार्हद्रथ वंश के ही हैं। इस स्थिति में यह औसत ठीक ही है। यह भी उल्लेखनीय है कि बार्हद्रथ और शुंग वंशों के राजाओं को छोड़कर अन्य वंशों में जिन राजाओं की आयु अधिक रही है, उनसे पहले और बाद वाले राजा की आयु कम रही है। स्पष्ट है कि पहले वाला राजा जल्दी मर गया और उसके कम आयु वाले पुत्र को गद्दी जल्दी मिल गई और वह ज्यादा समय तक राज्य करता रहा तो उसके पुत्र को शासन करने के लिए कम समय मिला। इंग्लैण्ड में विक्टोरिया को गद्दी छोटी आयु में मिल जाने से और अधिक वर्षों तक जीवित रहने के कारण उसके पुत्र एडवर्डअष्टम को राज्य करने के लिए केवल 7-8 वर्ष ही मिले थे।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि राजाओं की आयु और शासन अवधि की अधिकता के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं है कि पूरी की पूरी सूचियों को अतिरंजित, अस्वाभाविक और अप्रामाणिक करार दे दिया जाए।

सिकन्दर का भारत पर आक्रमण 327 ई.पू. में हुआ और सेंड्रोकोट्टस (चन्द्रगुप्त मौर्य) 320 ईसापूर्व भारत का सम्राट बना

भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने की दृष्टि से कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने यद्यपि आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए पहले भारतीय ग्रन्थों की ओर ध्यान दिया तो अवश्य किन्तु लक्ष्य भिन्न होने से वे ग्रन्थ उन्हें अपनी योजना में सहायक प्रतीतनहीं हुए। अतः उन्होंने भारत के संदर्भ में विदेशियों द्वारा लिखे गए ऐसे साहित्य पर निगाह डालनी प्रारम्भ कीजो उनके उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग दे सके। इस प्रयास में उन्हें यूनानी साहित्य में कुछ ऐसे तथ्य मिल गए जो उनके लिए उपयोगी हो सकते थे किन्तु वे तथ्य अपूर्ण, अस्पष्ट और अप्रामाणिक थे। अतः पहले तो उन्होंने सारा जोर उन्हें पूर्ण रूप से सत्य, स्पष्ट और प्रामाणिक सिद्ध करने में लगाया। अपनी बातों की युक्तिसंगत बनाने के लिए उन्हें कई प्रकार की नई-नई कल्पित कथाएँ बनानी पड़ीं। यह कल्पना भी उन्हीं में से एक है।

पाश्चात्य इतिहासकारों की इस कल्पना की पुष्टि न तो पुराणों सहित भारतीय साहित्य या अन्य स्रोतों से ही होती है और न ही यूनानी साहित्य कोछोड़कर भारत से इतर देशों के साहित्य या अन्य स्रोतों से होती है। स्वयं यूनानी साहित्य में भी ऐसे अनेक समसामयिक उल्लेखों का, जो कि होने ही चाहिए थे, अभाव है, जिनसे आक्रमण की पुष्टि हो सकती थी। यूनानी विवरणों के अनुसार ईसा की चौथी शताब्दी में यूनान का राजा सिकन्दर विश्व-विजय की आकांक्षा से एक बड़ी फौज लेकर यूनान से निकला और ईरान आदि को जीतता हुआ वह भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र केपास आ पहुँचा। यहाँ उसने छोटी-छोटी जातियों और राज्यों पर विजय पाई। इन विजयों से प्रोत्साहित होकर वह भारत की ओर बढ़ा, जहाँ उसकी पहली मुठभेड़ झेलम और चिनाव के बीच के छोटे से प्रदेश के शासक पुरु से हुई। उसमें यद्यपि वह जीत गया किन्तु विजय पाने के लिए उसे जो कुछ करना पड़ा, उससे तथा अपने सैनिकों के विद्रोह के कारण उसका साहस टूट गया और उसे विश्व-विजय के अपने स्वप्न को छोड़कर स्वदेश वापस लौट जाना पड़ा।

यूनानी इतिहासकारों ने इस घटना को जहाँ बहुत बढ़ा-चढ़ा कर चित्रित किया है वहीं भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा भी इसे इतना महत्वपूर्ण मान लिया गया कि इसके आधार पर 327 ई. पू. में सिकन्दर के आक्रमण के समय सेंड्रोकोट्टस के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य को जीवित मानकर आक्रमण के पश्चात 320 ई. पू. को उसके राज्यारोहण की तिथि घोषित करके उसके भारत सम्राट बनने की भी बात कर दी। यही नहीं, इस तिथि के आधार पर भारत के सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास के तिथिक्रम की भी कल्पना कर डाली किन्तु यह युद्ध हुआ भी है या नहीं, इस विषय में विभिन्न विद्वानों के मत अलग-अलग हैं। यदि यह युद्ध हुआ ही नहींतो 320 ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य का भारत सम्राट बनना कैसे संभव हो सकता है?

इस आक्रमण की स्थिति भारत तथा भारतेतर देशों केसाक्ष्यों से इस प्रकार बनती है-

भारतीय साक्ष्य

ऐतिहासिक – भारत के इतिहास का जो ब्योरा विभिन्न पुराणों तथा संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के अनेक ग्रन्थों में दिया हुआ है उसमें इस आक्रमण का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अतः भारत के इतिहास की दृष्टि से इसे प्रामाणिक मानना कठिन है।

साहित्यिक– भारत की तत्कालीन साहित्यिक रचनाएँ, यथा- वररुचि की कविताएँ, ययाति की कथाएँ, यवकृति पियंगु, सुमनोत्तरा, वासवदत्ता आदि, इस विषय पर मौन हैं। अतः इस प्रश्न पर वे भी प्रकाश डालने में असमर्थ हैं। यही नहीं, पुरु नाम के किसी राजा का भारतीय साहित्य की किसी भी प्राचीन रचना में कोई भी उल्लेख कहीं भी नहीं मिलता और मेगस्थनीज का तो दूर-दूर तक पता नहीं है। हाँ, हिन्दी तथा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं के कतिपय अर्वाचीन नाटकों में अवश्य ही इस घटना का चित्रण मिलता है।

साहित्येतर ग्रन्थ – साहित्यिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य विभिन्न विषयों, यथा- आयुर्वेद, ज्योतिष, राजनीति, समाजनीति आदि के ग्रन्थों में भी, जिनमें भारत के अनेक ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं, इसका उल्लेख नहीं मिलता। चाणक्य का अर्थशास्त्र, पतंजलि का महाभाष्य आदि ग्रन्थ भी इस विषय पर मौन हैं।

भारतेतर देशों के साक्ष्य

साहित्यिक

पड़ोसी देशों का साहित्य पड़ोसी देशों का साहित्य – उस समय के भारतवर्ष के वाङ्मय में ही नहीं, तत्कालीन त्रिबिष्टक (तिब्बत), सीलोन (श्रीलंका) तथा नेपाल के ग्रन्थों मेंभी भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के बारे में ही नहीं स्वयं तथाकथित विश्व-विजय के आकांक्षी सिकन्दर के बारेमें भी कोई उल्लेख नहीं मिलता।

यूनानी साहित्य – विभिन्न यूनानी ग्रन्थों में उपलब्ध मेगस्थनीज के कथनों के अंशों में तथा टाल्मी, प्लिनी, प्लूटार्क, एरियन आदि विभिन्न यूनानी लेखकों की रचनाओं में सिकन्दर के आक्रमण के बारे में विविध उल्लेख मिलते हैं। इन्हीं में सेंड्रोकोट्टस का वर्णन भी मिलता है किन्तु वह चन्द्रगुप्त मौर्य है, इस सम्बन्ध में किसी भी ग्रन्थ में कोई उल्लेख नहीं हुआ है। यह तो भारतीय इतिहास के अंग्रेज लेखकों की कल्पना है। यदि वास्तव में ही सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य होता और उसके समय में ही यूनानी साहित्य लिखा गया होता तो उसमें अन्य अनेक समसामयिक तथ्य भीहोने चाहिए थे, जो कि उसमें नहीं हैं। इससे चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में आक्रमण हुआ था, इस पर प्रश्नचिन्ह् लग जाता है। इस दृष्टि से निम्नलिखित तथ्य विचारणीय हैं-

नन्द का कोई उल्लेख नहीं नन्द का कोई उल्लेख नहीं- सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत सम्राट के पद पर महापद्मनन्द का नाम लिया जाता है किन्तु उस नन्द के बारेमें यूनानी साहित्य में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता। सभी लेखकों की रचनाएँ इस विषय पर मौन हैं।
जैन्ड्रेमस (Xandrammes) का उल्लेख अवश्य मिलता है किन्तु इस शब्द का नन्द से न तो ध्वनि-साम्य है और न ही किसी और प्रकार से समानता है।
इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि भले ही जोन्स आदि ने यह माना हो कि सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध की गद्दी पर नन्द बैठा हुआ था किन्तु इलियट के ‘भारत का इतिहास‘, भाग-1, पृ. 108-109 के अनुसार सिकन्दर के हमले के समय ‘हल‘ नाम का राजा गद्दी पर था। भारतीय पौराणिक तिथिक्रम के अनुसार हल का राज्यकाल लगभग 490ई. पू. में बैठता है। अतः इस सम्बन्ध में निश्चय से नहीं कहा जा सकता कि सिकन्दर का हमला कब हुआथा ?
टी. एस. नारायण शास्त्री का सिकन्दर के आक्रमण के सम्बन्ध में कहना है कि यद्यपि स्मिथ और उनके अन्य प्रशंसकों ने सिकन्दर के झेलम तक आने का उल्लेख किया है किन्तु वह वास्तव में तक्षशिला से आगे भारत में कभी आया ही नहीं। वहीं उसके सिपाहियों ने रोना-धोना शुरू कर दिया था। अतः उसके सतलुज तक आने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता (‘एज ऑफ शंकर‘ (1917 ई.), भाग-1, पृष्ठ 96-97)
चाणक्य का कोई उल्लेख नहीं- भारतीय स्रोतों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी अपने गुरु चाणक्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप मिली थी। वह चन्द्रगुप्त मौर्य का गुरु, महामंत्री और देश की राजनीति की धुरी था लेकिन तत्कालीन यूनानी साहित्य में चाणक्यका कहीं भी, किसी भी प्रकार का और कोई भी उल्लेख नहीं मिलता।

उक्त समसामयिक तथ्यों का यूनानी साहित्य में उल्लेख न होने से यह सन्देह होता है कि क्या ये वर्णन चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बंधित हैं? यदि सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य था तो चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बंधित इन महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख यूनानी साहित्य में क्यों नहीं किया गया ?

इस प्रकार न तो भारतीय साक्ष्य और न ही यूनानी साहित्य सहित अन्य भारतेतर देशों के साक्ष्य यह सिद्ध करने में समर्थ हैं कि विश्व-विजय के स्वप्नद्रष्टासिकन्दर ने चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में भारत पर आक्रमण किया था और सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य था, विशेषकर इसलिए कि भारतीय पौराणिक आधार पर चन्द्रगुप्त मौर्य 320 ई. पू. से काफी समय पूर्व अर्थात 1534 ई. पू. में मगध की गद्दी पर बैठा था और वही भारत का सम्राट बना था। दूसरे शब्दों में किसी भी आधार पर न तो सिकन्दर के 327 ई. पू. में हुए आक्रमण की और न ही चन्द्रगुप्त मौर्य के 320 ई. पू. में भारत का सम्राट बनने की बात की पुष्टि होती है। अतः यह भी मात्र एक भ्रान्त धारणा ही सिद्ध होती है किन्तु भारत के इतिहास को विकृत करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है।

यूनानी साहित्य में वर्णित सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्तमौर्य

यूनानी साहित्य में बताया गया है कि सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय यहाँ सेंड्रोकोट्टस नाम का एक बहुत वीर, योग्य और कुशल व्यक्ति था, जो सिकन्दर के भारत से चले जाने के बाद 320 ई.पू. में प्रस्सी की गद्दी पर बैठा था और भारत का सम्राट बना था। जोन्स ने उसे ही चन्द्रगुप्त मौर्य मानकर 28 फरवरी, 1793 को सगर्व यह घोषणा कर डाली कि उसने चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में सेंड्रोकोट्टस को पाकर भारत के इतिहास की सबसे बड़ी, सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे कठिन समस्या का निदान पा लिया।

इस प्रश्न पर कि क्या सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्त मौर्य है, विचार करने के लिए यह जान लेना उचित होगा कि सेंड्रोकोट्टस के सम्बन्ध में प्राचीन यूनानी साहित्य में जो कुछ लिखा मिलता है, क्या वह सब चन्द्रगुप्त मौर्य पर घटता है ? यूनानी साहित्य में सेंड्रोकोट्टस के संदर्भ में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें लिखी हुई मिलती हैं-

(1) सेंड्रोकोट्टस 6 लाख सेना लेकर सारे भारत में घूमा था और अनेक राजाओं को अपने अधीन किया था।
(2) सेंड्रोकोट्टस ने मगध के पहले सम्राट को मारकर साम्राज्य प्राप्त किया था।
(3) सेल्युकस ने युद्ध में हारने के पश्चात अपनी पुत्री का विवाह सेंड्रोकोट्टस से किया था।
(4) जिस क्षेत्र में पालीबोथ्रा स्थित है, वह भारत मेंबड़ा प्रसिद्ध था। वहाँ के राजा अपने नाम के साथ पालीबोथ्री उपनाम अवश्य लगाते थे।

उक्त बातों को भारतीय स्रोतों, यथा- पुराणों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य के संदर्भ में आए उल्लेखों से मिलान करने पर पाते हैं कि उसके सम्बन्ध में ये बातें तथ्यों से परे हैं, क्योंकि-

  • (1) चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत में इतने विशाल सैनिक अभियान करने की आवश्यकता हुई ही नहीं।
  • (2) यूनानी लेखकों की इस स्थापना की पुष्टि में किसीभी अन्य स्रोत से कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि यह यूनानी लेखकों की अपनी ही कल्पना है। कारण मगध के सम्राट नन्द को तो चाणक्य ने अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति हेतु मरवाया था।
  • (3) चन्द्रगुप्त मौर्य का विवाह किसी यूनानी लड़की से हुआ था, इसका उल्लेख भी किसी भारतीय स्रोत में नहीं मिलता। पं. भगवद्दत्त ने भी अपनी पुस्तक ‘भारतवर्ष का बृहद् इतिहास‘, में माना है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के विदेशी लड़की के साथ विवाह का कोई भी ऐतिहासिक आधार उपलब्ध नहीं है।

चन्द्रगुप्त मौर्य के विदेशी कन्या के विवाह के सम्बन्ध में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सिकन्दर का आक्रमण 327 ई. पू. में हुआ था और उस समय चन्द्रगुप्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। यदि उस समय चन्द्रगुप्त 24-25 वर्ष का भी रहाहोगा तो 320 ई. पू. में गद्दी पर बैठने के समय वह 31-32 वर्ष का अवश्य हो गया होगा। सिकन्दर के आक्रमण के 25 वर्ष बाद सेल्युकस ने भारत पर आक्रमण किया था। युद्ध में हारने के पश्चात यदि उसनेअपनी पुत्री की शादी चन्द्रगुप्त से की होगी तो उस समय उसकी आयु 57-58 वर्ष की अवश्य रही होगी। सामान्यः यह आयु नए विवाह करने की नहीं होती। इसके लिए कुछ विद्वानों का यह कहना है कि राजनीतिक विवाह में आयु का प्रश्न नहीं होता।

दूसरी ओर कुछ नाटकों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्युकस की पुत्री हेलन या कार्नेलिया की सिकन्दर के आक्रमण के समय यूनानी शिविर में प्रणय चर्चा का उल्लेख किया गया है किन्तु क्या यहाँ से जाने के 25 वर्ष बाद तक वह चन्द्रगुप्त के लिए प्रेम संजोए अविवाहित बैठी रही होगी ? यह बात असंभव न होते हुए भी जमती नहीं।

इस संदर्भ में भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार द्वारा ‘प्राचीन भारत‘ के पृष्ठ 84 पर कहे गए ये शब्द भी उल्लेखनीय हैं कि- ‘‘चन्द्रगुप्त सेल्युकस की लड़ाई का विस्तृत वर्णन यवन लेखकों ने नहीं किया है। फलतः कुछ लोगों ने तो यह भी सन्देह प्रकट किया है कि उन दोनों में कोई युद्ध हुआ भी था ?‘‘ यदि युद्ध हुआ ही नहीं तो सेल्युकस की लड़की से विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता।

  • (4) यूनानी साहित्य में सेंड्रोकोट्टस के सम्बन्ध में यह भी लिखा मिलता है कि जिस क्षेत्र में ‘पालीबोथ्रा‘ स्थित है वह भारत भर में बड़ा प्रसिद्ध है और वहाँ के राजा अपने नाम के साथ ‘पालीबोथ्री‘ उपनाम भी लगाते थे। उदाहरण के लिए जैसे सेंड्रोकोट्टस ने किया था। इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने ‘मौर्य‘ तो अपने पारिवारिक नाम केरूप में लगाया था, उपनाम के रूप में नहीं।

ऐतिहासिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि उक्त बातों का मौर्य वंश के पश्चात मगध साम्राज्य पर आने वाले चौथे राजवंश ‘गुप्त वंश‘ के राजाओं के साथ कुछ-कुछ मेल हो जाता है। जैसे, जहाँ तक बड़ी सेना लेकर भारत-विजय करने और विदेशी राजा की पुत्री से विवाह करने की बात है, तो यह दोनों बातें गुप्त राजवंश के दूसरे राजासमुद्रगुप्त से मेल खाती हैं। समुद्रगुप्त ने विशाल सेना के बल पर भारत विजय करके अश्वमेध यज्ञ किया था। उसके सम्बन्ध में हरिषेण द्वारा इलाहाबाद में स्थापित स्तम्भ पर खुदवाए विवरण से उसकी विजय आदि के अलावा यह भी ज्ञात होता है कि पश्चिमोत्तर क्षेत्र में युद्ध-विजय के पश्चात उसे किसी विदेशी राजा नेअपनी कन्या उपहार में दी थी।

जहाँ तक मगध के सम्राट को मारकर राज्य हथियाने की बात है तो यह बात तो गुप्त वंश के प्रथम पुरुष ‘चन्द्रगुप्त‘ से मेल खाती है। उसने ही पहले आन्ध्र वंश के अन्तिम राजा चन्द्रश्री या चन्द्रमस को और बाद में उसके पुत्र को मारकर गद्दी हथियाई थी।

नाम के साथ उपनाम जोड़ने की जहाँ तक बात है तो यहप्रथा भी गुप्त वंश के राजाओं में थी, जैसे-

क्र.सं. — राजा का नाम — उपनाम

1. चन्द्रगुप्त प्रथम—विजयादित्य

2. समुद्रगुप्त — अशोकादित्य

3. चन्द्रगुप्त द्वितीय — विक्रमादिव्य

4. कुमारगुप्त प्रथम—महेन्द्रादित्य आदि

सूची से स्पष्ट हो जाता है कि इस वंश के हर राजा ने अपने नाम के साथ उपनाम ‘आदित्य‘ जोड़ा है। गुप्त वंश के राजा सूर्यवंशी थे। उनमें सूर्य के लिए ‘आदित्य‘ शब्द उपनाम में जोड़ने की परम्परा थी अर्थात नाम के साथ उपनाम जोड़ने की बात भी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मेल नहीं खाती।

स्पष्ट है कि सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य नहीं है, जिसे जोन्स ने जबरदस्ती बनाया है।

पालीबोथ्रा ही पाटलिपुत्र

यूनानी साहित्य के अनुसार पालीबोथ्रा चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र ही था। इस पर भी भारतीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना आवश्यक हैकिन्तु पहले यह जान लेना उचित होगा कि पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मानने की दृष्टि से मेगस्थनीज तथा अन्य यूनानी लेखकों की विभिन्न रचनाओं में क्या-क्या कहा गया है-

(1) …… परन्तु प्रस्सई शक्ति में बढ़े-चढ़े हैं …. उनकी राजधानी पालीबोथ्रा ही है। यह बहुत बड़ा और धनी नगर है। इस नगर के कारण अनेक लोग इस प्रदेश के निवासियों को पालीबोथ्री कहते हैं। यही नहीं, गंगा के साथ-साथ का सारा भू-भाग इसी नाम से पुकारा जाता है।
(2) वह (हरकुलिश-सरकुलेश-विष्णु) अनेक नगरों का निर्माता था। उनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध पालीबोथ्रा था।
(3) जोमेनस (यमुना) नदी पालीबोथ्रा (पाटलिपुत्र) में से होकर बहती हुई मेथोरा (मथुरा) और करिसोबोरा के मध्य में गंगा से मिलती है।
(4) परन्तु एक पथ भी है, जो पालीबोथ्रा में से होकर भारत को जाता है।
(5) प्रस्सी राज्य की सीमा सिन्धु पुलिंद तक है।
(6) पालीबोथ्रा गंगा-यमुना के संगम से 425 मील है और समुद्र में गंगा के गिरने के स्थान से 738 मील है।
(7) पालीबोथ्रा गंगा और इरेन्नोबोस के संगम पर स्थित है।

यूनानियों द्वारा कथित उक्त आधारों पर विचार करने के उपरान्त इनमें से किसी आधार पर भी यह नहीं माना जा सकता कि पालीबोथ्रा पाटलिपुत्र था, क्योंकि-

  • (1) यूनानियों द्वारा उल्लिखित पालीबोथ्रा को प्रस्सी राज्य की राजधानी बताया गया था, भारतवर्ष की या मगध राज्य की राजधानी नहीं। जहाँ तक पालीबोथ्रा के आसपास के गंगा क्षेत्र के ‘पालीबोथ्री‘ कहलाने और वहाँ के निवासियों के अपने नाम के साथ ‘पालीबोथ्री‘ जोड़ने की बात है, पाटलिपुत्र के साथ मिलान करने पर दोनों ही बातें मेल नहीं खाती क्योंकि वह सारा क्षेत्र मगध कहलाता था और सामान्यतः वहाँ का कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ अपने देश के नाम के अनुसार ‘मागधी‘ नहीं लगाता था।
  • (2) यूनानियों का पालीबोथ्रा नगर हरकुलिश-विष्णु का बसाया हुआ था। जबकि पाटलिपुत्र नगर सम्राट बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु द्वारा सैनिक दृष्टि से बसाया गया था। यह ठीक है कि कुछ स्थानों पर इस नगर के किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बसाए जाने का उल्लेखभी मिलता है लेकिन अधिकतर विद्वान इसे अजातशत्रु द्वारा ही बसाया गया मानते हैं।
  • (3) यमुना नदी पालीबोथ्रा से होकर बहती थी और उसके एक ओर मथुरा तथा दूसरी ओर करिसोबोरा था किन्तु पाटलिपुत्र के आसपास तो क्या मीलों दूर तक यमुना नदी का न तो पहले ही पता था और न ही अब है।
  • (4) यूनानियों की कल्पना का भारत पालीबोथ्रा के आगे था क्योंकि उनके अनुसार पालीबोथ्रा में से होकर एक पथ भारत को जाता था। यदि ऐसा ही था तो क्या यूनानियों की दृष्टि में पाटलिपुत्र के पश्चिम में फैला इतना बड़ा भू-भाग, भारत नहीं था ? लेकिन ऐसा नहीं था क्योंकि विभिन्न यूनानी लेखकों ने अपनी रचनाओं में भारत की जो लम्बाई-चौड़ाई बताई है, वह पूरे भारत की माप है।
  • (5) सिन्धु पुलिन्द को प्रस्सी राज्य की सीमा पर बताया है। यदि पाटलिपुत्र से इसका सम्बन्ध जोड़ा जाए तो बिहार में कौन सा सिन्धु पुलिन्द था ? यह बात एकदम असंभव लगती है। महाभारत के अनुसार तो सिन्धु-पुलिन्दक उस समय अलग राज्य थे जो संभवतः भारत के मध्य क्षेत्र में थे-
चेदिवत्सः करुपाश्च भोजाः सिन्धुपुलिन्दकाः (म. भी. पर्व)
  • (6) पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मान लेने पर न तो वहाँसे गंगा-यमुना का संगम 425 मील ही बनता है और न ही समुद्र तट से पाटलिपुत्र 738 मील ही बनता है। समुद्रसे पाटलिपुत्र की दूरी तभी निश्चित की जा सकती है, जब पालीबोथ्रा का स्थान निश्चित हो जाए।
  • (7) मेगस्थनीज के अनुसार पालीबोथ्रा गंगा और इरेन्नोबोस (Errannoboas / हिरण्यबाहु) के संगम पर बसा हुआ है, जबकि पाटलिपुत्र गंगा और सोन नदी के संगम पर बसा हुआ है। यूनानी लेखक एरियन ने लिखा है कि यह संगम प्रस्सी राज्य की सीमाओं में था और मेगस्थनीज के अनुसार प्रस्सी राज्य की सीमा सिन्धु पुलिन्द तक थी। अब कहाँ गंगा-जमुना का संगम, कहाँ गंगा और सोन का संगम और कहाँ सिन्धु-पुलिन्द, फिर इन सबके साथ पाटलिपुत्र का सम्बन्ध कैसे जोड़ा गया, यह सब बड़ा विचित्र लगता है।

उक्त सभी तथ्यों और अन्य बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि मेगस्थनीज या अन्य यूनानी लेखक भारत की सही भौगोलिक स्थिति को समझ पाने में असमर्थ रहे हैं।

पाटलिपुत्र मौर्य साम्राज्य की राजधानी कभी भी नहीं रहा

यूनानी इतिहासकार भले ही पाटलिपुत्र को मौर्य साम्राज्य की राजधानी मानते रहे हों किन्तु भारतीय पुराणों के अनुसार वह कभी भी मौर्यों की राजधानी नहीं रहा। पुराणों के अनुसार जब से मगध राज्य की स्थापना हुई थी तभी से अर्थात जरासन्ध के पिता बृहद्रथ के समय के पूर्व से ही मगध साम्राज्य की राजधानी गिरिब्रज (वर्तमान राजगृह) रही है। महाभारत युद्ध के पश्चात मगध साम्राज्य से सम्बंधित बार्हद्रथ, प्रद्योत, शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग, कण्व, आन्ध्र-आठों वंशों के समय में इसकी राजधानीगिरिब्रज ही रही है। पाटलिपुत्र की स्थापना तो शिशुनाग वंश के अजातशत्रु ने कराई थी और वह भीमात्र सैनिक दृष्टि से सुरक्षा के लिए।

वैज्ञानिक

भारतीय कालगणना अतिरंजित और अवैज्ञानिक

संसार में कालगणना की कई पद्धतियाँ प्रचलित हैं किन्तु उनमें से भारतीय कालगणना की ही एकमात्र पद्धति ऐसी है जिसका सम्बन्ध वास्तविक रूप में काल से जुड़ा है और जो सृष्टि के प्रारम्भ से ही एक ठोस वैज्ञानिक आधार पर निर्मित होकर चलती आ रही है। कारण, वह आकाश में स्थित नक्षत्रों, यथा- सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि की गति पर आधारित है। प्राचीनभारतीय साहित्य में भारतीय कालगणना के मुख्य अंग युग, मन्वन्तर, कल्प आदि, की जो वर्ष गणना दी गईहै, वह नक्षत्रों की गति पर आधारित होने से पूर्णतः विज्ञान सम्मत है।

भारतीय कालगणना

ग्रहगतियों के आधार पर भारतीय ग्रन्थों में नौ प्रकार के कालमानों का निरूपण किया गया है। इनके नाम हैं- ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, बार्हस्पत्य, सौर, सावन, चान्द्र और नाक्षत्र। इन नवों कालमानों में नाक्षत्रमान सबसे छोटा है। पृथ्वी जितने समय में अपनी धुरी का एक चक्र पूरा करती है, उतने समय को एक नाक्षत्र दिन कहा जाता है। यही दिन या वार ही पक्षों में, पक्ष ही मासों में, मास ही वर्षों में, वर्ष ही युगों में, युग ही महायुगों में, महायुग ही मन्वन्तरों और मन्वन्तर ही कल्पों में बदलते जाते हैं।

भारत की उक्त कालगणना नक्षत्रों की गति की गणना पर निर्भर करती है और गति की गणना गणित के माध्यम से की जाती है। अर्थात भारतीय कालगणना पूर्ण रूप से अंकगणित पर आधारित है। इसकी पुष्टि ज्योतिष शास्त्र के साथ-साथ ऐतिहासिक, साहित्यिक और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टियों से भी होती है, यथा-

अंकगणित – भारतीय कालगणना के प्रत्येक अंग अर्थात दिन, पक्ष, मास, वर्ष, युग, चतुर्युगी, मन्वन्तर, कल्प आदि के संदर्भ में जो गणनाएँ दी गई हैं, उनके पीछे पौराणिक आंकड़ों का एक पुष्ट आधार है। अंकगणित पर आधारित होने से इन पौराणिक आंकड़ों में युक्ति है, तर्क है, सत्यता है और पूर्णता है। ऐसी पूर्णता आधुनिक विज्ञान द्वारा निर्धारित आंकड़ों में नहीं हैक्योंकि वे वास्तविक नहीं मात्र कल्पना और अनुमान पर आधारित हैं। मन्वन्तर सिद्धान्त के अनुसार एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगी या महायुग होते हैं। एक चतुर्युगी या महायुग में 1, 2, 3 और 4 के आनुपातिक क्रम से एक-एक बार कलियुग (4.32 लाख वर्ष), द्वापर (8.64 लाख वर्ष), त्रेता (12.96 लाख वर्ष) और सत्युग (17.28 लाख वर्ष) आते हैं अर्थात एक चतुर्युगी में 43.20 लाख वर्ष या दस कलिमान होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के पश्चात सत्युग की अवधि के बराबर का सन्धि काल आता है। वर्तमान पृथ्वी के निर्माण के आरम्भ से अब तक 6 मन्वन्तर बीत चुके हैं और सातवें मन्वन्तर के अट्ठाइसवें महायुग के कलियुग के अब तक 5109 वर्ष बीते हैं। अंकगणित पर आधारित होने के कारण ही इस भारतीय कालगणना के अनुसार आज यह बताया जा सकता है कि वर्तमान सृष्टि को प्रारम्भ हुए आज 1,97,29,49,109 वर्ष हो चुके हैं तथा एक कल्प में 4,32,00,00,000 वर्ष होते हैं।

ज्योतिष शास्त्र’ – इतनी लम्बी कालगणना को विभिन्न पाश्चात्य ही नहीं अपितु अनेक आधुनिक भारतीय विद्वान भी मानने को तैयार भले ही न हों किन्तु इसकीपुष्टि ज्योतिष के ग्रन्थ ‘सूर्य सिद्धान्त‘ से हो जाती है। सूर्य सिद्धान्त के अध्याय 1 में कहा गया है कि – एक चतुर्युगी में सूर्य, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनि 43,20,000 भगण (राशि चक्र) परिवर्तन करते हैं। यही संख्या प्राचीन भारतीय साहित्य में चतुर्युगी के वर्षों की बताई गई है।

सूर्य सिद्धान्त में यह भी कहा गया है कि – सत्युग के अन्त में या त्रेता के प्रारम्भ में ‘पाद‘ और ‘मन्दोच्च‘ को छोड़कर सभी ग्रहों का मध्य स्थान मेषराशि में था। दूसरे शब्दों में उस समय 5वें कलियुग का प्रारम्भ था अर्थात हर 4.32 लाख वर्ष के बाद सात ग्रह एक युति में आ जाते हैं। (सूर्य सिद्धान्त 1.57) भारतीय कालगणना के उक्त वर्षों की पुष्टि ज्योतिष शास्त्र के ‘अयन दोलन‘ सिद्धान्त से भी हो जाती हैं।

ऐतिहासिक – ज्योतिष के आधार पर पुष्ट हो जाने पर भी भारतीय कालगणना की करोड़ों-करोड़ों वर्षों की संख्या पर फ्लीट सरीखे कई पाश्चात्य विद्वान ही नहीं अनेक भारतीय विद्वान भी यह कहकर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं कि कालगणना का यह प्रकार आर्य भट्ट से पूर्व था ही नहीं। इस संदर्भ में दो बातें उल्लेखनीय हैं, एक तो यह कि इस कालगणना को भारत में ही माना जाता रहा है, ऐसा नहीं है, इसे बेबिलोनिया, ईरान, स्कैण्डेनेविया आदि देशों में भी मान्यता प्राप्त रही है। ऐतिहासिक दृष्टि से बेबिलोनिया की सभ्यता ई. पू. तीसरी सहस्राब्दी में फूली-फली थी और उस समय तक आर्य भट्ट अवतरित नहीं हुए थे। दूसरे ये संख्याएँ वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थोंमें आए ब्योरों से भी पुष्ट होती हैं, जो निश्चितही आर्य भट्ट से पूर्व के ही है।

साहित्यिक – प्राचीन साहित्य चाहे ईरान और बेबिलोनिया का हो याभारत का सभी में कालगणना के संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं –

  • ईरान के ग्रन्थ: ईरान के निवासियों के विश्वास के अनुसार काल का एक युगचक्र 12,000 वर्ष का होता है। (दि एज ऑफ दि वर्ल्ड‘, पृष्ठ 3) भारतीय ग्रन्थों में भी एक चतुर्युगी में 12,000 देव वर्ष होने का उल्लेख आया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में लिखा है- एकं वा एतद्दैवानामदः यत्सम्वतसरः (3.9.22) अर्थात मानव का एक सम्वतसर देवताओं का एक दिन होता है। इसकी पुष्टि ईरानियों के यहाँ इस संदर्भ में आए उल्लेख से हो जाती है। उनके यहाँ लिखा है- ‘तएच अयर मइन्यएन्ते यतयरे‘ अर्थात देवताओं का एक दिन मानव का एक वर्ष होता है। (स्व. पं. रघुनन्दन शर्मा कृत ‘वैदिक सम्पत्ति‘, पृष्ठ 94 पर उद्धृत)। दूसरे शब्दों में देवताओं का एक वर्ष मानव के 360 वर्ष के बराबर होता है अर्थात देवताओं के 12,000 वर्ष मानव के 12,000 ग 360 त्र43,20,000 वर्ष के बराबर हुए। यही संख्या भारतीय कालगणना के अनुसार एक महायुग या चतुर्युगी की होती है।
  • बेबिलोनिया के ग्रन्थ बेबिलोनिया के ग्रन्थ: बेबिलोनिया के ग्रन्थों में इस संदर्भ में उल्लिखित संख्या से भी भारतीय ग्रन्थों में बताई गई उक्त संख्या की पुष्टि हो जाती है। इस विषय में ‘एनल्स ऑफ दि भण्डारकर इन्स्टीट्युट, खण्ड प्ट, भाग-1, जुलाई, 1922‘ में दिए गए शाम शास्त्री के लेख ‘ओरिजिन ऑफ दि वीक‘ में उल्लिखित निम्नलिखित ब्योरा पठनीय है-
हमारे सूर्य सिद्धान्त (1.11.12) में जिस प्रकार दस स्वर का एक स्वांस, 6 स्वांसों की एक विनाड़ी, 60 विनाड़ियों की एक नाड़ी और 60 नाड़ियों का एक दिन होना लिखा है, उसी प्रकार से बेबिलोनिया के लोगों में ‘सास‘, सर और नेर की गिनती है। यह ‘सास‘, ‘सर‘ और ‘नेर‘, श्वांस, स्वर और नाड़ी का अपभ्रंश रूप ही है। बेबिलोनिया वालों का विश्वास रहाहै कि उनके दस राजाओं ने 120 सर राज्य किया था। बेरोसस (प्रसिद्ध ज्योतिषी) के अनुसार एक सास त्र 60 वर्ष, एक नेर त्र 60 ग 10 त्र600 वर्ष और एक सर 60 ग 60 त्र3600 वर्ष का होता है। 120 सर का कालखण्ड 3600 ग 120 त्र 4,32,000 वर्ष का होता है। यही कालखण्ड कलियुग का है। इससे सिद्ध होता है कि भारत की कालगणना का आधार मात्र कोरी कल्पना नहीं है, इसके पीछे ऐतिहासिक आधार है। (स्व. पं. रघुनन्दन शर्मा कृत ‘वैदिक सम्पत्ति‘ का पृष्ठ 94)
  • भारत के ग्रन्थ भारत के ग्रन्थ: इस संदर्भ में अथर्ववेद का मंत्र संख्या 10.7.9 दर्शनीय है। इसमें कहा गया है कि भूत भविष्यमय कालरूपी घर एक सहस्र स्तम्भों पर खड़ा किया गया है। अनेक विद्वानों का मानना है कि इन स्तम्भों के आलंकारिक वर्णन से एक कल्प में होने वाली एक सहस्र चतुर्युगियों का उल्लेख किया गया है। अथर्ववेद का 8.2.21 भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। इसमें कल्प के वर्षों की जो संख्या बताई गई है, वह इस प्रकार है- ‘शतं ते अयुतं हायनान्द्वे युगे त्रीणि चत्वारिकृण्मः‘ अर्थात सौ अयुत वर्षों के आगे 2, 3 और4 लिखने से कल्प की वर्ष संख्या आएगी। अयुत दस हजार का होता है, अतः सौ अयुत का मान 10 लाख या एक मिलियन हुआ। उसके आगे 2, 3 और 4 (अंकानां वामतो गति के अनुसार) लिखने पर कल्प की वर्ष संख्या 4,32,00,00,000 बनती है। यही संख्या एक सहस्र चतुर्युगियों के वर्षों की होती है।

चारों युगों के नामों के संदर्भ में यजुर्वेद के 30.18 की शरण में जाया जा सकता है, यथा-

‘कृतायादिनवर्द्ष त्रेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिनम् आस्कन्दाय सभास्थाणुम्‘‘।

इस मंत्र में कृत्युग (सत्युग) त्रेता, द्वापर और आस्कन्द (कलियुग) चारों युगों के नामों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

कालगणना के संदर्भ में विभिन्न भारतीय ग्रन्थों मेंयह तो बताया ही गया है कि कौन सा युग किस मास की कौन सी तिथि से प्रारम्भ होता है। महाभारत के वन पर्व के 118.67 में यह भी बताया गया है कि कलि प्रारम्भ में सात ग्रह एक युति में आ जाते हैं।

कहने का भाव है कि नक्षत्रों की गति पर आधारित भारतीय कालगणना के कालमानों की पुष्टि ईरान, बेबिलोनिया, स्कैण्डेविया आदि देशों के प्राचीन ग्रन्थों में आए उल्लेखों से ही नहीं भारत के वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, पुराण आदि ग्रन्थों में वर्णित कालमान के ब्योरों से भी होती है, अतः उसकी मान्यतापर प्रश्नचिन्ह् लगाना न्यायसंगत नहीं है। यह भ्रान्ति भी जानबूझ कर अंग्रेजी सत्ता द्वारा फैलाई गई थी।

प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा

किसी भी देश, भाषा, साहित्य या संस्कृति के इतिहास लेखन का एक महत्वपूर्ण तत्त्व उसका काल-निर्धारण होता है, क्योंकि काल विशेष में परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार आए बदलाव का विश्लेषण करके लेखक इनके उत्कर्ष-अपकर्ष, विकास-ह्रास, वैभव-पराभव का निष्कर्ष निकालकर इन पर विचार प्रकट करता है। भारतवर्ष में ऐतिहासिक दृष्टि से काल-निर्धारण की वैज्ञानिक आधारों पर एक सुदीर्घ और पुष्ट परम्परा विद्यमान रही है किन्तु पाश्चात्य विद्वानों ने पुरातन काल से चलते आ रहे काल-निर्धारण के सिद्धान्त को अर्थात भारतीय कालगणनाको अतिरंजित एवं अस्वाभाविक मानकर उसे अस्वीकार करके उसके स्थान पर अपनी काल-निर्धारण की पद्धति, जो मात्र कल्पना प्रसूत होने के कारण अत्यन्त ही अपुष्ट और अवैज्ञानिक थी, को मान्यता दी और उसके आधार पर भारतीय इतिहास में प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा की। जबकि भारत के इतिहास में इस नाम का कोई काल है ही नहीं क्योंकि यहाँ तो सृष्टि-प्रारम्भ से ही उसके विकास का इतिहास सुलभ है।

‘प्रागैतिहासिकता‘ का शाब्दिक अर्थ इतिहास से पूर्व केकाल की स्थिति से है। ‘इतिहास से पूर्व काल की स्थिति से‘ आधुनिक इतिहासकारों का अभिप्रायआदिमानव के भू-अवतरण और उसके बाद के उस प्रारम्भिक काल की स्थिति से है, जिसके सम्बन्ध में जानने, परखने और समझने के लिए आज उनके पास वह सब सामग्री, यथा- सिक्के, मोहरें, अभिलेख, पुरातन अवशेष आदि जो इतिहास जानने के प्रमुख साधन माने जाते हैं, सुलभ नहीं है किन्तु यह सब सामग्री उनको मानव जीवन की केवल भौतिक प्रगति की स्थिति का ही परिचय दे सकती है, उसकी धार्मिक और अध् यात्मिक प्रगति का नहीं। इस प्रगति के परिचय के लिए प्राचीन साहित्य चाहिए, जो भारतवर्ष के अलावा अन्य किसी भी देश में आज सुलभ नहीं है किन्तु उस साहित्य को आज के इतिहासकार ‘मिथ‘ कहते आ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आदि मानव के भू-अवतरण काल और उसके बाद के जिस काल के साहित्य को ‘मिथ‘ की कोटि में डाला जा रहा है उसको ही प्रागैतिहासिक काल का नाम दिया गया है। जबकि भारत के इतिहास में ऐसा कोई काल रहा ही नहीे क्योंकि यहाँ तो उस समय से इतिहास सुलभहै, जबकि सृष्टि के आरम्भ में भारत के ‘आत्म-भू‘ और ‘यूनानियों के आदम‘ अर्थात आदि मानव अथवा ब्रह्मा का आविर्भाव हुआ था। ‘शतपथ ब्राह्मण‘ तथा ‘पद्म‘ आदि पुराणों में सृष्टि निर्माण की चर्चा के संदर्भ में लिखा है कि पहले पृथ्वी एक द्वीपा थी, बाद में चतुर्द्वीपा हुई और उसके बाद में सप्तद्वीपा हो गई। आज इसी बात को ‘कान्टीनेन्टल ड्रिफ्टिंग थ्यॉरी‘ (महाद्वीपीय विचलन सिद्धान्त) कहा जाता है। पुराणों के अनुसार द्वीपों का विचलन शंकर के ताण्डव से जुड़ा है। शंकर के नृत्य करते समय पैरों की धमक से ही द्वीपों का विचलन होता है।

यही नहीं, भारत के प्राचीन साहित्य में तो इस सृष्टि से पूर्व की सृष्टि का उल्लेख भी मिलता है। सृष्टि का विलय प्रलय के काल में ही होता है। भारतीय साहित्य में प्रलय भी कई प्रकार की बताई गई है। कभी नैमित्तिक प्रलय होती है तो कभी प्राकृत प्रलय और कभी आत्यंतिक प्रलय। प्राकृत प्रलय की स्थिति में न सत रहता है न असत, न भूमि रहती है न पाताल, न अन्तरिक्ष रहता है न स्वर्ग, न रात का ज्ञान रहता है और न दिन का। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उस समय ब्रह्म की सत्ता के अलावा कुछ भी विद्यमान नहीं रहता। प्रलय काल में सब कुछ नष्ट हो जाने पर एक निश्चित कालावधि के बाद नई सृष्टि का निर्माण होता है, उसका सम्बंध पूर्व सृष्टि से अवश्यरहता है। पूर्व सृष्टि का ज्ञान हमें ऋग्वेद के मंत्र 10.190.1-2 से होता है- ‘‘तब प्रलय हो गई। …. तदनन्तर ईश्वर ने सम्पूर्ण विश्व (सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि) को पहले की तरह फिर से बनाया।‘‘

भारतीय दृष्टि से काल की कोई सीमा नहीं है, वह अनन्तहै। जिस भारतवर्ष में सृष्टि के प्रलय और निर्माण के सम्बन्ध में इतनी सूक्षमता, गहनता औरगम्भीरता से विचार किया गया हो और जहाँ इस सृष्टि के निर्माण काल से ही नहीं पिछली सृष्टि का विवरण भी रखा गया हो, वहाँ के इतिहास में प्रागैतिहासिकता की अवधारणा करने का प्रश्न ही नहीं उठता।

वैज्ञानिकता के नाम पर ऐतिहासिक तथ्यों की उलट-फेर

भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने की प्रक्रिया में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा वैज्ञानिकता के नाम पर भारतीय इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, धर्म-दर्शन और साहित्य की श्रेष्ठता और प्राचीनता को कम से कम करके आंकने के भी घनघोर प्रयास किए गए। इन प्रयासों के अन्तर्गत बड़े-बड़े इतिहासकारों और पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ऐसे अनेक मिथ्या तर्क दिए हैं, अनेक मिथ्या आधारों की स्थापनाएँ कीं और अनेक मिथ्या कल्पनाएँ तथा विवेचनाएँ कीं, जो नितान्त बाल बुद्धि जैसी लगती हैं।

भारत के प्रसिद्ध पुरातात्त्विक श्री बी. बी. लाल ने वैज्ञानिक आधार पर भारत के प्राचीन इतिहास का काल-निर्धारण करते हुए महाभारत युद्ध को 836 ई. पू. में हुआ माना है। महाभारत युद्ध के लिए इस काल को निर्धारित करने की प्रक्रिया का ब्योरा प्रस्तुत करते हुए श्री लाल ने कहा है कि भारतीय इतिहास के मुस्लिम काल में दिल्ली में कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बहादुरशाह जफर तक 47 मुस्लिम बादशाह हुए हैं और उन्होंने कुल 652 वर्ष राज्य किया है। इस हिसाब से प्रति राजा का औसत राज्यकाल 13.9 अर्थात 14 वर्ष बनता है। इसी आधार पर परीक्षित से लेकर उदयनतक हुए 24 राजाओं का राज्यकाल उन्होंने 24 ग 14 त्र 336 वर्ष माना है। उदयन का समय उन्होंने 500 ई. पू. कल्पित किया है क्योंकि बौद्ध ग्रन्थों में उदयन को गौतमबुद्ध का लगभग समकालीन माना गया है। अतः500 ई. पू. में 336 वर्ष जोड़कर 836 ई. पू. वर्ष बनाकर इसे महाभारत का काल माना है। जबकि वास्तव में महाभारत का युद्ध उस समय से बहुत पहले हुआ था।

डॉ. के. एम. मुन्शी के निरीक्षण में और डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार के प्रधान सम्पादकत्व में तैयार ‘दि हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ इण्डियन प्यूपिल‘ ने तो वैज्ञानिकता के नाम पर भारत के इतिहास के संदर्भ में और भी खिलवाड़ किया है। इस ग्रन्थ में जो कुछ लिखा गया है वह उससे बहुत भिन्न नहीं है जो पाश्चात्य इतिहासकारों ने लिखा है।

जहाँ तक महाभारत युद्ध का काल जानने के लिए उसे हजारों-हजारों वर्ष बाद पैदा हुए मुसलमान बादशाहों के औसत राज्यकाल को आधार बनाने का प्रश्न है तो इसका उत्तर तो श्री लाल ही जानें किन्तु यहाँ यह प्रश्न उठता ही है कि उनके मस्तिष्क में यह बात क्यों नहीं आई कि प्राचीन काल में दीर्घ जीवन भारत की एक विशिष्टता रही है। उस काल का औसत भारतीय राजा काफी समय बाद के औसत मुसलमानी बादशाह से काफी अधिक काल तक जीवित रहा होगा। भारत के लोगों के दीर्घ जीवन के बारे में मेगस्थनीज आदि यूनानी विद्वानों के निम्नलिखित विचार उल्लेखनीय हैं-

1. भारतीयों को न कभी सरदर्द, न दन्तशूल और न अन्य बीमारियाँ होती थीं। न ही शरीर के किसी भाग में अल्सर होता था। वे 120, 130, 150 वर्ष तक जीते थे। कोई-कोई तो 200 वर्ष तक भी जीते थे।

(एरियन की – इण्डिका‘ का XII, XV और फैग XXII. सी – टीशियस की ‘एनशिएंट इण्डिया‘, अनुवादक – जे. डब्ल्यु. मैकक्रिण्डले, पृष्ठ 18)

यदि आज से 2300 वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज निरोग रहकर 200 वर्ष तक जीवित रहते थे तो 5000 या 6000 वर्ष पूर्व तो वे और भी अच्छी तरह से तथा और भी लम्बी आयु तक जीवित रहते होंगे। अतः मुसलमानी काल की इस प्रकार की औसत निकालकर प्राचीन भारतीय राजाओं के राज्यकाल को निकालना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। इस संदर्भमें यह भी उल्लेखनीय है कि विजयनगर का ‘रामराजा‘ 96 वर्ष की आयु में तालिकोट की युद्धभूमि पर गया था और पंवार वंश के राजा गंगासिंह ने मोहम्मद गोरी के विरुद्ध पृथ्वीराज को युद्ध में 90 वर्ष की आयु में सहयोग दिया था। यही नहीं, महाभारत के युद्ध के समय आचार्य द्रोण और महाराजा द्रोपद की आयु लगभग 300 वर्ष, पितामह भीष्म की आयु 170-180 वर्ष तथा श्रीकृष्ण और अर्जुन की आयु 88 वर्ष मानी जाती है।

अर्वाचीन और प्राचीन काल में कतिपय भारतीयों के आयु मान के उक्त उदाहरणों के समक्ष 14 वर्ष की औसत से उस समय के राजाओं की आयु निकालने की वैज्ञानिकता सामान्यतः बुद्धिगम्य नहीं हो पाती। लगता है यह सब कुछ भारतीय इतिहास को विकृत करने की दृष्टि से किया/कराया गया है।

विविध

ऐतिहासिक महापुरुषों की तिथियाँ

पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भारतीय इतिहास के लिए निर्धारित तिथिक्रम के आधार पर किसी भी ऐतिहासिक महापुरुष की जन्मतिथि और महान सम्राट के राज्यारोहण की तिथि पर विचार किया जाता है तो वह असंगत लगती है। इस खण्ड में कतिपय ऐसे ही ऐतिहासिक महापुरुषों कीजन्मतिथियों और सम्राटों के राज्यारोहण की तिथियों के विषय में विचार किया जा रहा है –

(क) गौतम बुद्ध का आविर्भाव 563 ईपू. में हुआ – गौतम बुद्ध का आविर्भाव भारतीय इतिहास की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है किन्तु यह खेद का ही विषय है कि उनकी जन्म और महानिर्वाण की तिथियों के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी भारतवर्ष में सुलभ नहीं है। हाँ, यह जानकारी तो विभिन्न स्रोतोंसे अवश्य मिल जाती है कि वे 80 वर्ष तक जीवित रहे थे। देश-विदेश में प्रचलित बौद्ध परम्पराओं से भी उनके जन्म और महानिर्वाण के सम्बंध में प्रामाणिक तिथियाँ नहीं मिल पाई हैं। हर जगह ये तिथियाँ अलग-अलग ही बताई जाती हैं।

पाश्चात्य इतिहासकारों ने गौतम बुद्ध का जन्म वर्ष निकालने के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण के लिए कल्पित तिथि 320 ई. पू. में से उसके और उसके पुत्र बिन्दुसार के राज्यकालों के वर्षों को घटाकर अशोक का राज्यारोहण वर्ष 265 ई. पू. निकाला है। इस 265 ई. पू. में 218 वर्ष जोड़कर गौतम बुद्ध के महानिर्वाण का वर्ष 265 + 218 = 483 ई. पू. निश्चित किया है क्योंकि सीलोन के क्रोनिकल महावंश में लिखा हुआ है कि गौतम बुद्ध के महानिर्वाण के 218 वर्ष बाद अशोक का राज्यारोहण हुआ था। इसी को आधार मानकर 483 ई. पू. में गौतम बुद्ध की पूर्ण आयु के 80 वर्ष मिलाकर 483 + 80 = 563 ई. पू. को उनके जन्म का वर्ष माना गया है। जबकि ऐसे अनेक विद्वान हैं जो इस तिथि को सही नहीं मानते। विगत दो शताब्दियों से लगातार प्रयासों के बावजूद गौतम बुद्ध के जन्म की तिथि निश्चित नहीं हो सकी है।

19वीं शताब्दी में पाश्चात्य विद्वानों ने बुद्ध के काल-निर्धारण के संदर्भ में 25वीं शताब्दी ई. पू. से 5वीं शताब्दी ई. पू. तक की अनेक तिथियाँ एकत्रित की थीं, जिनका डॉ. विल्सन ने विश्लेषण किया था। श्रीराम साठे ने ‘डेट्स ऑफ बुद्धा‘ के पृष्ठ 2 से 4 तक डॉ. विल्सन की तिथियों के साथ प्रिन्सेप तथा कुछ अन्य लोगों द्वारा दी गई तिथियाँ भी दी हैं। उनसे ज्ञात होता है कि-

  • बुद्ध की तिथियों, यथा- 2500 ई. पू. और 563 ई. पू. में लगभग 2000 वर्ष का अन्तराल है।
  • पदमाकरपो (भूटानी लामा) और भारतीय स्रोतों के आधार पर निकाली गईं क्रमशः 1858 ई. पू. और 1807 ई. पू. की तिथियों में परस्पर अन्तर बहुत कम है।
  • कल्हण के नाम से दी गई 1332 ई. पू. की तिथि भी भ्रमपूर्ण ही लगती है। कारण ‘राजतरंगिणी‘ में गौतम बुद्ध का महानिर्वाण तुरुष्क वंश के राज्यारम्भ से 150 वर्ष पूर्व माना है और तुरुष्क वंश का समय 1294-1234 ई. पू. के बीच में बैठता है। इसके हिसाब से गौतम बुद्ध की महानिर्वाण की तिथि 1294 $ 150 $ 80 = 1524 ई. पू. की बैठती है।
  • अधिकतर विद्वान 1027 ई. पू. की तिथि पर सहमत हैं।

संदर्भित तिथियों को महानिर्वाण की तिथियाँ मानकरउनमें 80 वर्ष (बुद्ध का जीवन काल) जोड़ने पर जो तिथियाँ बनती हैं वे भी वर्तमान में प्रचलित भारत के इतिहास में बुद्ध के जन्मकाल के लिए दी गई 563 ई. पू. से मेल नहीं खातीं।

भारतीय पुराणों से मिली विभिन्न राजवंशों के राजाओं के राज्यारोहण की तिथियों के आधार पर जो जानकारी मिलती है, उसके हिसाब से गौतम बुद्ध का जन्म 1886-87 ई. पू. में बैठता है। वे महाभारत युद्ध के पश्चात मगध की गद्दी पर बैठने वाले तीसरे राजवंश-शिशुनाग वंश के चौथे, पाँचवें और छठे राजाओं के राज्यकाल में, यथा- 1892 से 1787 ई. पू.के बीच में हुए थे।

ऐसा भी कहा जाता है कि गौतम बुद्ध का महाप्रस्थान अजातशत्रु के राज्यारोहण के 8 वर्ष बाद हुआ था अर्थात 1814 – 8 = 1806 ई. पू. में हुआ था। श्रीलंका में सुलभ विवरणों से भी ऐसी ही जानकारी मिलती है कि बुद्ध का महानिर्वाण अजातशत्रु के राज्यारोहण के 8 वर्ष बाद हुआ था। इस विषय में तो सभी एकमत हैं कि गौतम बुद्ध 80 वर्ष तक जिए थे। अतः उनका जन्म 1806 + 80 = 1886 (1887) ई. पू. में हुआ होगा। यह समय क्षेत्रज के राज्यकाल का था जोकि शिशुनाग वंश का चौथा राजा था। जबकि वर्तमान इतिहासज्ञों द्वारा जो तिथि गौतम बुद्ध के जन्मकाल की दी गई है, वह 563 ई. पू. है।

उक्त भारतीय विवरणों के आधारों पर बुद्ध के जन्म के लिए बनी तिथियों और प्रचलित तिथि (563 ई. पू.) में भी काफी (लगभग 1300 वर्षों का) अन्तर आता है।

(ख) आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य 788 ई में अवतरित हुए – आचार्य शंकर के जन्मकाल में भी लगभग 1300 वर्ष का ही अन्तर पाश्चात्य और भारतीय आधारों से आता है। पाश्चात्य विद्वानों ने यूँ तो आचार्य शंकर के जन्म के सम्बन्ध में बहुत सारी तिथियाँ दी हैं किन्तु अधिकतर विद्वान 788 ई. पर सहमत हैं। (इस संदर्भमें विस्तृत जानकारी के लिए सूर्य भारती प्रकाशन, नई सड़क, दिल्ली-6 द्वारा प्रकाशित लेखक की पुस्तक ‘भारतीय एकात्मता के अग्रदूत आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य‘ देखें) जबकि भारतीय (शंकर मठ)परम्परा के अनुसार उनका जन्मकाल 509 ई. पू. बनता है। द्वारका और कांची कामकोटि पीठ के पीठाधिपतियों की सूचियों में प्रत्येक आचार्य का नाम, गद्दी पर बैठने का वर्ष और कितने वर्ष वे गद्दी पर रहे, इन सबका पूरा वर्णन दिया गया है। आचार्य शंकर की जन्मतिथि की दृष्टि से वे सूचियाँ बहुत महत्वपूर्ण हैं।

अन्तर्साक्ष्य अर्थात आचार्य जी की अपनी रचनाओं के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपनी किसी भी रचना में न तो अपने सम्बन्ध में और नही किसी रचना विशेष के रचनाकाल के सम्बन्ध में ही कुछ लिखा है। आचार्य शंकर के सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपने समस्त साहित्य में कहीं भी यवनों के आक्रमण और भारत में उनके निवासके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं लिखा है जबकि अनेक विद्वानों द्वारा आचार्य जी का आविर्भाव काल ईसा की आठवीं शताब्दी से लेकर नौवीं शताब्दी तक माना गया है। यदि आचार्य जी इस अवधि में अवतरित हुए होतेतो उनकी किसी न किसी रचना में किसी न किसी रूप में मुसलमानों का उल्लेख अवश्य रहा होता क्योंकि मुसलमानों के सिन्ध प्रदेश पर आक्रमण ईसा का 7वीं शताब्दी के अन्त में होने शुरू हो गए थे एवं आक्रमण के पश्चात काफी मुसलमान वहीं रहने भी लगे थे। कोई भी विचारक या लेखक अपनी समकालीन स्थितियों से आँख मूंदकर नहीं रह सकता। उसकी रचनाओं में तत्कालीन स्थिति का उल्लेख किसी न किसी रूप में आ ही जाता है। अतः यह तो निश्चित है कि आचार्य जी का जन्म छठी शताब्दी से पूर्व ही हुआ है।यदि ऐसा है तो स्वामी चिद्सुखाचार्य जी की रचना, मठों की आचार्य-सूचियाँ, पौराणिक तिथिक्रम आदि पुष्ट आधारों पर निर्मित 509 ई. पू. को ही शंकराचार्य जी की जन्म तिथि मानना उचित होगा। इस तिथि की पुष्टि ‘नेपाल राजवंशावली‘ से भी होती है।

(ग) अशोक ने 265 ई.पू. में शासन संभाला– सम्राट अशोक को भारत के इतिहास में ही नहीं विश्व के इतिहास में जो महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है, वह सर्वविदित है। आज अशोक का नाम संसार केमहानतम व्यक्तियों में गिना जाता है। इसकी प्रसिद्धि का मुख्य कारण उसके द्वारा चट्टानों और प्रस्तरस्तम्भों पर लिखवाए गए वे अजर-अमर शिलालेख हैं, जो सम्पूर्ण राज्य में इतस्ततः विद्यमान रहे हैं किन्तु उनसे उसके व्यक्तिगत जीवन अर्थात जन्म, मरण, माता-पिता के नाम, शासनकाल आदि के सम्बन्ध में कोई विशेष जानकारी सुलभ नहीं हो पाती। यह भी उल्लेखनीय है कि उन शिलालेखों में सेअशोक का नाम केवल एक ही छोटे शिलालेख में मिलता है। शेष पर तो ‘देवानांप्रिय‘ शब्द ही आया है। अतः इससे यह पता नहीं चल पाता कि यह नाम वास्तव में कौन से अशोक का है क्योंकि भारत में भिन्न-भिन्न कालों में अशोक नाम के चार राजा हुए हैं, यथा-

  • पहला अशोक – कल्हण की ‘राजतरंगिणी‘ के अनुसार कश्मीर के राजाओं की सूची में 48वें राजा का नाम ‘अशोक‘ था, जो कि कनिष्क से तीन पीढ़ीऊपर था। वह कश्मीर के गोनन्द राजवंश का था और उसको धर्माशोक भी कहते थे।
  • दूसरा अशोक – पुराणों के अनुसार मौर्य वंश का तीसरा राजा अशोकवर्धन था। यह चन्द्रगुप्त मौर्य का पौत्र था। इसने बाद में बौद्ध धर्म अपनाकर धर्म-प्रचार के लिए बहुत कार्य किया था।
  • तीसरा अशोक – गुप्त वंश के दूसरे राजा समुद्रगुप्त ने अपना उपनाम अशोकादित्य रखा हुआ था। अनेक स्थानों पर उसको मात्र ‘अशोक‘ ही कहा गयाहै। वह बड़ा ही साहसी तथा वीर राजा था। उसने सम्पूर्ण देश में बड़े व्यापक स्तर पर विजय अभियान चलाया था।
  • चौथा अशोक चौथा अशोक – पुराणों के अनुसार शिशुनाग वंश के दूसरे राजा का नाम अशोक था। वह शिशुनाग का पुत्र था। उसका रंग अधिक काला होने से उसे कालाशोक या ‘काकवर्णा‘ नाम से भी पुकारा जाता था।

बौद्ध ग्रन्थों में यद्यपि अशोक के सम्बन्ध में बड़े विस्तार से चर्चा की गई है किन्तु उनके वर्णन एक-दूसरे से भिन्न हैं। इस संदर्भ में आचार्य रामदेव का कहना है कि बौद्ध लेखकों ने अशोकादित्य (समुद्रगुप्त) और गोनन्दी अशोक (कश्मीर) दोनों कोमिलाकर एक चक्रवर्ती अशोक की कल्पना कर ली है।

— (‘भारतवर्ष का इतिहास‘, तृतीय खण्ड, प्रथम भाग, पृ.41)

इस स्थिति में यह निष्कर्ष निकाल पाना कि इनमें से बौद्ध धर्म-प्रचारक देवानांप्रिय अशोक कौन सा है, कठिन है। जहाँ तक अशोक के 265 ई. पू. में गद्दी पर बैठने की बात है, इस सम्बन्ध में भी अनेक मत हैं –

  • मैक्समूलर – 850 ई. पू. (चीनी विवरण) और 315 ई. पू. (सीलोनी विवरण)
  • फ्लीट – 1260 ई. पू. (राजतरंगिणी)
  • भारतीय कालगणना – 1472 ई. पू.

यहाँ उल्लेखनीय है कि पौराणिक कालगणना के अनुसार अशोक मौर्य के राज्य के लिए निकले 1472 से 1436 ई. पू. के काल में और ‘राजतरंगिणी‘ के आधार पर धर्माशोक के लिए निकले राज्यकाल 1448 से 1400 ई. पू. में कुछ-कुछ समानता है। जबकिभारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले इतिहासकारों द्वारा निकाले गए 265 ई. पू. के कालसे कोई समानता ही नहीं है। उक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान इतिहासकारों द्वारा अशोक के सम्बन्ध में निर्धारित काल-निर्णय भी बहुत उलझा हुआ है। अतः 265 ई. पू. में वह गद्दी पर बैठा ही था, यह निश्चित रूप से नहीं माना जा सकता। जहाँ तक आधुनिकरूप में भारत का इतिहास लिखने वालों और भारतीय पौराणिक आधार पर कालगणना करने वालों की अशोक के राज्यारोहण की तिथि का प्रश्न है, दोनों में लगभग 1200 वर्ष का अन्तर आ जाता है।

(घ) कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. में हुआ – कनिष्क के राज्यारोहण के सम्बन्ध में भी पाश्चात्य औरभारतीय आधारों पर निकाले गए कालखण्डों में गौतम बुद्ध आदि की तरह लगभग 1300 वर्ष का ही अन्तर आता है। पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 78 ई. निश्चित कीगई है जबकि पं. कोटावेंकटचलम द्वारा ‘क्रोनोलोजी ऑफ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘ में दिएगए ‘राजतरंगिणी‘ के ब्योरों के अनुसार कनिष्क ने कश्मीर में 1254 ई. पू. के आसपास राज्य किया था।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य तिथियों की भ्रान्ति के लिए तो कोई न कोई कारण आज का इतिहासकार दे भी रहा है किन्तु कनिष्क के सम्बन्ध में तिथि की भ्रान्ति का कोई निश्चित उत्तर उसके पास नहीं है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार का कहना है –

‘‘कनिष्क की तिथि भारतीय तिथिक्रम की सबसे उलझी हुईसमस्या है। इस विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है किन्तु नए प्रमाणों के अभाव में कोई बात निश्चित रूप से नहीं कही जा सकती।…..‘‘ (डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार कृत ‘प्राचीन भारत‘ पृ. 101 – पादटिप्पणी)

चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक और कनिष्क की जोन्स आदि पाश्चात्य विद्वानों द्वारा निर्धारित तिथियों के संदर्भ में श्री ए. बी. त्यागराज अय्यर की ‘इण्डियन आर्कीटेक्चर‘ का निम्नलिखित उद्धरण भी ध्यान देने योग्य है –

एथेन्स में कुछ समय पूर्व एक समाधि मिली थी, उस पर लिखा था कि- ‘यहाँ बौद्धगया के एक श्रवणाचार्य लेटे हुए हैं। एक शाक्य मुनि को उनके यूनानी शिष्य द्वारा ग्रीक देश ले जाया गया था। समाधि में स्थित शाक्य मुनि की मृत्यु 1000 ई. पू. में बताई गई है।‘ यदि शाक्य साधु को 1000 ई. पू. के आसपास यूनान ले जाया गया था तो कनिष्क की तिथि कम से कम 1100 ई. पू. और अशोक की 1250 ई. पू. और चन्द्रगुप्त मौर्य की 1300 ई. पू. होनी चाहिए। यदि यह बात है तो जोन्स की धारणा कि यूनानी साहित्य का सेड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य सेल्युकस निकेटर का समकालीन था, जिसने 303 ई. पू. में भारत पर आक्रमण किया था, एकदम निराधार और अनर्गल है। (‘दि प्लाट इन इण्डियन क्रोनोलोजी‘ पृ. 9)

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कनिष्क के राज्यारोहण के संदर्भ में दी गई तिथि भी मात्र एक भ्रान्ति ही है। भारतीय इतिहास की महानतम विभूतियों की तिथियों में यह अन्तर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा जान-बूझकर डाला गया है ताकि उनके द्वारा पूर्व निर्धारितकालगणना सही सिद्ध हो जाए।

(ङ) विक्रम सम्वत के प्रवर्तक उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं – भारतवर्ष में श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतम बुद्ध और आचार्यशंकर के पश्चात यदि किसी का व्यक्तित्व सर्वाधिक विख्यात रहा है तो वह उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का रहा है किन्तु आश्चर्य तो इस बात का है कि जिस राजा की इतनी प्रसिद्धि रही हो उसे कल्पना जगतका वासी मानकर पाश्चात्य विद्वानों ने उसके ऐतिहासिक व्यक्तित्व को ही नकार दिया है।

उज्जैनी के महाराजा विक्रमादित्य के ऐतिहासिक व्यक्तित्व को नकारने से पूर्व निम्नलिखित तथ्यों पर विचार कर लिया जाना अपेक्षित था, यथा-

(1) भारत का पौराणिक महापुरुष हैं भारत का पौराणिक महापुरुष हैं – महाराजा विक्रमादित्य का सविस्तार वर्णन भविष्य, स्कन्द आदि पुराणों में दिया गया है। भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व के प्रथम खण्ड में दिए गए ब्योरे के अनुसार विक्रमादित्य ईसवी सन के प्रारम्भ में जीवित थे। उनका जन्म कलि के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ई. पू. में हुआ था और उन्होंने 100 वर्ष तक राज्य किया था। (गीता प्रेस, गोरखपुर, ‘संक्षिप्त भविष्य पुराण‘, पृ. 245)
(2) साहित्यिक रचनाओं का अमर नायक है साहित्यिक रचनाओं का अमर नायक है – भारत की संस्कृत, प्राकृत, अर्द्धमागधी, हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला आदि भाषाओं के ग्रन्थों में विक्रमादित्य से सम्बंधित ऐसे अनेक विवरण मिलते हैं जिनमें उसकी वीरता, उदारता, दया, क्षमा आदि गुणों की अमर गाथाएँ भरी हुई हैं।
(3) दन्तकथाओं और लोकगीतो का प्रेरणापुंज है – देश के विभिन्न भागों में स्थानीय भाषाओं में ही नहीं बोलियों में भी ऐसी अनेक दन्तकथाएँ, लोकगाथाएँ, लोकगीत प्रचलित हैं जिसमें बड़े व्यापक रूप में विक्रमादित्य के भिन्न-भिन्न गुणों का गान किया गया है।
(4) सम्वत का प्रवर्तक है – देश में एक नहीं अनेक विद्वान ऐसे हैं जो 57 ई. पू.में प्रवर्तित हुए विक्रम सम्वत को उज्जैनी के राजा विक्रमादित्य द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। भारतवर्ष में कलि सम्वत के समान ही इस सम्वत का प्रयोग सब क्षेत्रों में किया जाता है।

इस सम्वत के प्रवर्तन की पुष्टि ‘ज्योतिर्विदाभरण‘ ग्रन्थ से होती है। जो कि 3068 कलि अर्थात 34 ई. पू. में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने3044 कलि अर्थात 57 ई. पू. में विक्रम सम्वत चलाया था।

(5) भारत का ऐतिहासिक व्यक्तित्त्व है – कल्हण की ‘राजतरंगिणी‘ के अनुसार 14 ई. के आसपास कश्मीर में अंध युधिष्ठिर के वंश के राजा हिरण्य के निःसन्तान मर जाने पर अराजकता फैल गई थी जिसको देखकर वहाँ के मंत्रियों की सलाह पर उज्जैनी केराजा विक्रमादित्य ने मातृगुप्त (जिसे कई लोग कालीदास भी मानते हैं) को कश्मीर का राज्य सम्भालने के लिए भेजा था।

‘नेपाल राजवंशावली‘ में भी नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय (ईसा पूर्व पहली शताब्दी) में उज्जैनी के विक्रमादित्य के नेपाल आने का उल्लेख किया गया है। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि विक्रमादित्य ने नेपाल के राजा को अपने अधीन सामन्त का पद स्वीकार करने के लिए कहा था। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि विक्रमादित्य ने विक्रम सम्वत की स्थापना नेपाल में ही की थी।

बाबू वृन्दावनदास ‘प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य‘ में लिखते हैं कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने ही विक्रम सम्वत की स्थापना 57 ई. पू. में की थी। उनका यह भी कहना है कि-

‘‘भारत में अन्य सभी सम्राटों, जिनके नाम के साथ विक्रमादित्य लगा हुआ है, यथा- श्रीहर्ष, शूद्रक, हल, चन्द्रगुप्त द्वितीय, शिलादित्य, यशोधर्मन आदि, ने ‘विक्रमादित्य‘ को उपाधि के रूप में ग्रहण किया है, जबकि उज्जैनी के इस राजा का मूल नाम ही विक्रमादित्य है। उपाधि के स्थान परमूल नाम अधिक महत्त्वपूर्ण है।‘‘

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यदि पाश्चात्योन्मुखी आधुनिक भारतीय इतिहासकारों की यह बात मान ली जाती है कि ईसा पूर्व और ईसा बाद की पहली शताब्दियों में कोई विक्रमादित्य नहीं हुआ तो अरब देश के उस कवि की कविता का क्या उत्तर होगा जिसे उसनेमोहम्मद साहब के जन्म से 165 वर्ष पूर्व लिखा था। उस कविता का हिन्दी अनुवाद जो विक्रम सम्वत के 2000 वर्षों के पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 1946 ई. में मनाए गए उत्सव के स्मृति अंक में दिया गयाथा, इस प्रकार है-

‘‘भाग्यशाली हैं वे, जो विक्रमादित्य के शासन में जन्मे या जीवित रहे। वह सुशील, उदार, कर्तव्य परायण शासक, प्रजाहित में दक्ष था, पर उस समय अरब परमात्मा का अस्तित्त्व भूलकर वासनासक्त जीवन बिता रहा था किन्तु उस अवस्था में सूर्योदय जैसा ज्ञान और विद्या का प्रकाश दयालु विक्रम राजा की देन थी, जिसने पराए होतेहुए भी हमसे कोई भेदनहीं बरता जिसने निजी पवित्र (वैदिक) संस्कृति हम में फैलाई और निजी देश से विद्वान, पंडित और पुरोहित भेजे …… पवित्र ज्ञान की प्राप्ति हुई और सत्य का मार्ग दिखाया।‘‘

यह कविता मूल रूप में सुलतान सलीम के काल (1742 ई.) में तैयार ‘सैरउलओकुन‘ नाम के अरबी काव्य संग्रह से ली गई है।

कहने का अभिप्राय यह है कि पाश्चात्य विद्वानों ने जिस विक्रमादित्य के व्यक्तित्त्व को ही नकार दिया है उसके विषय में भविष्य पुराण, ज्योतिर्विदाभरण, सिद्धान्त शिरोमणि (भास्काराचार्य), नेपाल राजवंशावली, राजतरंगिणी, महावंश, शतपथ ब्राह्मण की विभिन्न टीकाएँ, बौद्ध ग्रन्थ, जैन ग्रन्थ तथा अनुश्रुतियाँ आदि भारतीय ऐतिहासिक स्रोत एकमत हैं। अतः लगता है कि यह स्थिति भारत के इतिहास को विकृत करने के लिए जान बूझकर लाई गई है।

सरस्वती नदी का कोई अस्तित्व नहीं

भारत के पुरातन साहित्य में, यथा- वेदों, पुराणोंआदि में ही नहीं रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत् सरीखे ग्रन्थों में भी सरस्वती का स्मरण बड़ी गरिमा के साथ किया गया है। भारत भू के न केवल धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक ही वरन् ऐतिहासिक आदि परिवेशों में भी सरस्वती का बड़ा महत्त्व दर्शाया गया है। इस नदी के साथ भारतवासियों के अनेक सुखद और आधारभूत सम्बन्ध रहे हैं। इसके पावन तट पर भारतीय जीवन पद्धति के विविध आयामों का विकास हुआ है। इसके सान्निध्य में वेदों का संकलन हुआ है। ऋग्वेद के 2.41.16 में इसका उल्लेख मातृशक्तियों में सर्वोत्तम माता, नदियों में श्रेष्ठतम नदी और देवियों में सर्वाधिक महीयशी देवी के रूप में हुआ है-

अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वती ।
अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ।।

यह 6 नदियों की माता सप्तमी नदी रही है। यह ‘स्वयं पयसा‘ (अपने ही जल से भरपूर) और विशाल रही है। यह आदि मानव के नेत्रोन्मीलन से पूर्व-काल में न जाने कब से बहती आ रही थी। वास्तव में सरस्वती नदी का अस्तित्व ऋग्वेद की ऋचाओं के संकलन से बहुत पहले का है। ऐसी महत्वपूर्ण नदी के आज भारत में दर्शन न हो पाने के कारण आधुनिकविद्वान इसके अस्तित्व को ही मानने से इन्कार करते आ रहे हैं किन्तु इस नदी के अस्तित्व का विश्वास तो तब हुआ जब एक अमेरिकन उपग्रह ने भूमि के अन्दर दबी इस नदी के चित्र खींचकर पृथ्वी पर भेजे। अहमदाबाद के रिसर्च सेन्टर ने उन चित्रों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि शिमला के निकट शिवालिक पहाड़ों से कच्छ की खाड़ी तक भूमि के अन्दर एक सूखी हुई नदी का तल विद्यमान है, जिसकी चौड़ाई कहीं-कहीं 6 कि.मी. है। उनका यह भी कहना है कि उस समय सतलुज और यमुना नदी इसी नदी में मिलती थी। सेटेलाइट द्वारा भेजे गए चित्रों से पूर्व भी बहुत से विद्वान इसी प्रकार के निष्कर्षों पर पहुँच चुके थे। राजस्थान सरकार के एक अधिकारी एन. एन. गोडबोले ने इस नदी के क्षेत्र में विविध कुओं के जल का रासायनिक परीक्षण करने पर पाया था कि सभी के जल में रसायन एक जैसा ही है। जबकि इस नदी के क्षेत्र के कुओं से कुछ फर्लांग दूर स्थित कुओं के जलों का रासायनिक विश्लेषण दूसरे प्रकार का निकला। अनुसंधान कर्ताओं ने यह भी पाया कि राजस्थान के रेत के नीचे बाढ़ की मिट्टी की मोटी तह है, जो इस बात की प्रतीक है कि यहाँ कोई बड़ी नदी वर्षानुवर्ष तक बहती रही है एवं उसी के कारण यह बाढ़ की मिट्टी यहाँ इकट्ठी हुई है। कुछ दिन पूर्व ही केन्द्रीय जल बोर्ड के वैज्ञानिकों को हरियाणाऔर पंजाब के साथ-साथ राजस्थान के जैसलमेर जिले में सरस्वती नदी की मौजूदगी के ठोस सबूत मिले हैं। (‘दैनिक जागरण‘, 10.1.2002)

ऐसी स्थिति में यह मान लिया जाना कि सरस्वती नदी का कोई अस्तित्त्व नहीं है उचित नहीं है। निश्चित ही यह भी एक भ्रान्ति ही है, जो भारत के इतिहास को ‘विकृत‘ करने की दृष्टि से जान बूझकर फैलाई गई है।

भारत का शासन समग्र रूप में एक केन्द्रीय सत्ता के अन्तर्गत केवल अंग्रेजों के शासनकाल में आया, उससे पूर्व वह कभी भी एक राष्ट्र के रूप में नहीं रहा

भारतवर्ष के संदर्भ में केन्द्रीय सत्ता का उल्लेख वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, पुराणों आदि में मिलता है और यह स्वाभाविक बात है कि ग्रन्थों में उल्लेख उसीबात का होता है जिसका अस्तित्त्व या तो ग्रन्थों के लेखन के समय में हो या उससे पूर्व रहा हो। यद्यपि यह भी सही है कि आधुनिक मानदण्डों के अनुसार सत्ता का एक राजनीतिक केन्द्र समूचे देश में कदाचित नहीं रहा किन्तु अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों और पुराणों म ें विभिन्न साम्राज्यों के लिए सार्वभौम या समुद्रपर्यन्त जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है। इस बात के उल्लेख भी प्राचीन ग्रन्थों में मिलते हैं कि अनेक चक्रवर्ती सम्राटों ने अश्वमेध, राजसूय या वाजपेय आदि यज्ञ करके देश में अपनी प्रभुसत्ताएँ स्थापित की थीं। इसीप्रकार से कितने ही सम्राटों ने दिग्विजय करके सार्वभौम सत्ताओं का निर्माण भी किया था। ऐसे सम्राटों में प्राचीन काल के यौवनाश्व अश्वपति, हरिश्चन्द्र, अम्बरीश, ययाति, भरत, मान्धाता, सगर, रघु, युधिष्ठिर आदि और अर्वाचीन काल के महापद्मनन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं।

यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक मानदण्डों के अनुसार केवल वे ही शासक चक्रवर्ती सम्राट की पदवी पाते थे और वे ही अश्वमेध आदि यज्ञ करने के अधिकारी होते थे, जिनका प्रभुत्व उस समय के ज्ञात कुल क्षेत्र पर स्थापित हो जाता था। प्रकारान्तर से यह प्राचीन भारतीय परिवेश और मानदण्डों के अनुसार केन्द्रीय सार्वभौम सत्ता का ही द्योतक है अतः पाश्चात्यों की उपरोक्त मान्यता तत्त्वतः सही नहीं है।

सांस्कृतिक दृष्टि से तो प्रारम्भ से ही भारत एक राष्ट्र के रूप में रहा है। यहाँ के अवतारी पुरुष, यहाँ के महापुरुष, यहाँ का इतिहास, यहाँ की भाषाएँ,यहाँ के त्यौहार, यहाँ के मठ-मन्दिर, यहाँ की सामाजिक मान्यताएँ, यहाँ के मानबिन्दु आदि देश के सभी भागों, सभी राज्यों और सभी क्षेत्रों के निवासियों को जहाँ एक संगठित और समान समाज के अंग बनाने में सहायक रहे हैं वहीं उनमें यह भावना भी भरते रहे हैं कि वे सब एक ही मातृभूमि या पितृभूमि की सन्तान हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि राष्ट्र एक सांस्कृतिक अवधारणा है। इस दृष्टि से विचार करने पर पाश्चात्यों तथा उनके परिवेश में ढले-पले भारतीय विद्वानों द्वारा प्रस्तुत यह विचार कि भारत राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है या यह देश प्रशासनिक दृष्टि से कभी एक केन्द्रीय सत्ता के अधीन नहीं रहा, न केवल भ्रामक सिद्ध होता है अपितु इस राष्ट्र के तेजोभंग करने के उद्देश्य से गढ़ा गया प्रतीत होता है। राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक किसी भी दृष्टि से क्यों न हो गहराई से विचार करने पर यह स्वार्थवश और जानबूझ कर फैलाया गया मात्र एक भ्रम लगता है क्योंकि भारत के प्राचीन ग्रन्थ अथर्ववेद में कहा गया है – ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः‘ (अ. 12.1.12) अर्थात यह भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं। अथर्ववेद के 4.2.5 के अनुसार हिमालय से समुद्र पर्यन्त फैला हुआ क्षेत्र भारत का ही था। विष्णुपुराण के 2.3.1 में कहा गया है- हिमालय के दक्षिण और समुद्र के उत्तर का भाग भारत है और उसकी सन्तान भारतीय हैं।

महाभारत के भीष्म पर्व के अध्याय 9 में भारत भूमि के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए उसे एक राष्ट्र के रूप में ही चित्रित किया गया है। तमिल काव्य संग्रह ‘पाडिट्रूप्पट्ट‘ में दी गई विभिन्न कविताएँ भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं जिनमें देश का वर्णन कन्याकुमारी से हिमालय तक कहकर किया गया है।

सदियों से ऋषि-महर्षि, साधु-सन्यासी, योगी-परिव्राजक, दार्शनिक-चिन्तक, कवि-लेखक आदि सबने इस देश को सदा-सर्वदा ही एक देश माना है। दक्षिण में पैदा हुए शंकराचार्य कश्मीर और असम क्यों गए और उन्होंने देश के चार कोनों में चार धाम क्यों स्थापित किए ? क्या इसीलिए नहीं कि वे इस देश को एक मानते थे ? असम के सन्त शंकरदेव और माधवदेव ने भी भारतवर्ष की बात की है –

‘‘धन्य-धन्य कलिकाल, धन्य नर तनुमाल धन्य जन्म भारतवरिषे‘‘।

इससे यह निष्कर्ष सहज ही में निकल आता है कि कन्याकुमारी से हिमालय तक फैले समस्त क्षेत्र में रहने वालों के लिए सदा से ही भारतवर्ष जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि रहा है और उनके लिए इस देश का कण-कण पावन, पूज्य और पवित्र रहा है फिर चाहे वह कण भारत के उन्नत ललाट हिमगिरि के धवल हिम शिखरों का हो या कन्याकुमारी पर भारत माँ के चरण प्रक्षालन करते हुए अनन्त सागर की उत्ताल तरंगों का।

भारत की इस समग्रता को और यहाँ के रहने वालों की इस समस्त भूमि के प्रति इस भावना को देखते हुए यह विचार कि भारत का शासन अंग्रेजों के आने से पूर्व समग्र रूप में कभी भी एक केन्द्रीय सत्ता के अधीन नहीं रहा और भारत कभी एक राष्ट्र के रूप में नहीं रहा, वह तो राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है, मात्र एक भ्रान्ति ही है जो जान बूझकर फैलाई गई है और आज भी फैलाई जा रही है।

New Source

DoThe Best
By DoThe Best September 30, 2017 11:40
Write a comment

No Comments

No Comments Yet!

Let me tell You a sad story ! There are no comments yet, but You can be first one to comment this article.

Write a comment
View comments

Write a comment

Your e-mail address will not be published.
Required fields are marked*

three × five =