पल्लव राज्य में वास्तुकला

DoThe Best
By DoThe Best September 29, 2015 12:46

शोर मंदिर और महाबलीपुरम के सप्तपगोडा मंदिर पल्लव कला के बेहतरीन उदाहरण थे. महाबलीपुरम एक ऐतिहासिक नगर है जो ‘मामल्लपुरम’ के नाम से भी जाना जाता है. महाबलीपुरम तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में है. इस धार्मिक केन्द्र को हिंदू पल्लव राजा नरसिंहदेव वर्मन ने सातवीं सदी में स्थापित किया था.

पल्लव वास्तुकला की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

• पल्लव वास्तुकला में मंदिरों का निर्माण के सन्दर्भ में बहुत सारे प्रमाण हैं- जैसे चट्टानों को काटकर पत्थरों से मंदिरों का निर्माण.

• 7 वीं शताब्दी में चट्टानों को काटकर बनाये गए मंदिरों के निर्माण पल्लव वास्तुकला के नवीन उदाहरण हैं. इसके अलावा भी 8 वीं और 9 वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान भी संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण किया गया था.

• पल्लवों के अधीन एक विशिष्ट शैली का विकास हुआ जो द्रविड शैली के नाम से विख्यात है.

पल्लवों की मंदिर स्थापत्य शैली पल्लव राजाओ के नाम पर चार शैलियों में विभक्त है.

1. महेन्द्रवर्मन शैली के मंदिर अपनी सादगी के लिए विख्यात हैं.

2. मामल्ल शैली के मंदिरो की मुख्या विशेषता मदप एवं रथ हैं. इस शैली की विशिष्टता का नमूना वाराह,महिष तथ पंचपाण्डव एवं सप्त-पैगोडा के मंदिरों में देखे जा सकते हैं.

3. राजसिंह शैली के मंदिरों में प्रमुख हैं महाबलीपुरम का समुद्रतटीय मंदिर, कांची के कैलाशनाथ और वैकुण्ठपेरूमल के मंदिर.

4. नन्दिवर्मन अथवा अपराजित शैली के मंदिर छोटे हैं. इनके निर्माण में स्तम्भ शिर्षों के विकास के अतिरिक्त कोई नवीनता दिखाई नहीं देती है. इस शैली के प्रमुख मंदिर हैं कांचीपुरम के मुक्तेश्वर और मतंगेश्वर मंदिर तथ गुदिमल्लम का परशुरामेश्वर मंदिर.

उल्लेखनीय है कि नंदीवर्मन शैली के मंदिर पल्लवों के पतन का स्पष्ट आभास देते हैं.

पल्लव राजाओं द्वारा निर्मित प्रसिद्ध मंदिरों में से कुछ निम्नलिखित हैं:

मंडगपट्टू  चट्टानों को काटकर निर्मित मंदिर

मंडगपट्टू मंदिर तमिलनाडु के विल्लुपुरम के निकट स्थित एक एकल चट्टानों को काटकर बनाया गया मंदिर है.
इस मंदिर में किसी भी धातु, ईंट या धातु से निर्मित किसी वस्तु का इस्तेमाल नहीं किया गया है. इस मंदिर में बड़े-बड़े द्वारपालों को बनाया गया है जोकि दक्षिण भारत के सभी मंदिरों की एक प्रमुख विशेषता के रूप में दर्शाया गया है.

कैलाश नाथ मंदिर कांचीपुरम

इस मंदिर का निर्माण नरसिंहवर्मन द्वितीय  के काल में किया गया था. यह मंदिर भारत में सबसे खूबसूरत मंदिरों में से एक है. कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम में स्थित एक हिन्दू मंदिर है. कैलाशनाथ मंदिर को राजसिद्धेश्वर मंदिर भी कहा जाता है. इस मंदिर को आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह की उपाधि) ने अपनी पत्नी की प्रार्थना पर बनवाया था. नरसिंहवर्मन द्वितीय  ने इसके अलावा आगमप्रिय और शंकरभक्त की भी उपाधि धारण की थी. इस मंदिर के अग्रभाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्रवर्मन तृतीय ने करवाया था. मंदिर में देवी पार्वती और शिव की नृत्य प्रतियोगिता को दर्शाया गया है. इस मंदिर के एक और विशेषता है की इसमें पल्लव राजाओं और रानियों की आदमकद प्रतिमायें लगी हैं.

शोर मंदिर, महाबलीपुरम

इस मंदिर का निर्माण नरसिंहवर्मन द्वितीय  के काल में किया गया ग्रेनाइट से करवाया गया था. इसे बंगाल की खाड़ी के शोर के रूप में जाना जाता है. यह संरचनात्मक मंदिरों की सूची में सबसे पुराना उदाहरण है. यह मंदिर यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल सूची के अंतर्गत शामिल किया गया है और भगवान् विष्णु को समर्पित है, जबकि दो मंदिरों को शिव को समर्पित किया गया है. इस मंदिर में भगवान शिव का एक शिवलिंग स्थारपित है, वैसे यह मंदिर भगवान विष्णुर को समर्पित है. इसी मंदिर परिसर में देवी दुर्गा का भी छोटा सा मंदिर है जिसमें उनकी मूर्ति के साथ एक शेर की मूर्ति भी बनी हुई है.

सप्त-पैगोडा

मण्डप एवं रथ मामल्ल शैली के प्रमुख उदहारण हैं इन्ही रथ शैली के अंतर्गत सप्त-पैगोडा के मंदिरों को शामिल किया जाता है .पत्थर की चट्टानों को काटकर रथ शैली के आठ मंदिरों (द्रौपदी रथ और सप्त-पैगोडा) का निर्माण किया गया है. सप्त-पैगोडा के अंतर्गत निम्नलिखित रथ बने हैं. धर्मराज रथ,भीम रथ,अर्जुन रथ, सहदेव रथ, गणेश रथ, वलेंयनकुट्ट रथ और पीदरीरथ.

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