पृथ्वी की धरातलीय संरचना

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By DoThe Best July 1, 2017 13:04

पृथ्वी की धरातलीय संरचना

पृथ्वी की धरातलीय संरचना

पर्वत

पर्वत धरातल के ऐसे ऊपर उठे भागों के रूप में जाने जाते हैं, जिनका ढाल तीव्र होता है और शिखर भाग संंकुचित क्षेत्र वाला होता है। पर्वतों का निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है-

मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) – पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा धरातलीय चट्टानों में मोड़ या वलन पडऩे के परिणामस्वरूप बने हुए पर्वतों को मोड़दार अथवा वलित पर्वत कहते हैं। उदाहरण- यूरोप के आल्प्स, दक्षिण अमेरिका के एण्डीज व भारत की अरावली शृंखला।

अवरोधी पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)– इन पर्वतों का निर्माण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण तनाव की शक्तियों से धरातल के किसी भाग में दरार पड़ जाने के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- यूरोप में ब्लैक फॉरेस्ट तथा वासगेस (फ्रांस) एवं पाकिस्तान में साल्ट रेंज।

 

ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic) – इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी द्वारा फेंके गए पदार्थों से होता है। उदाहरण- हवाई द्वीप का माउंट माउना लोआ व म्यांमार का माउंट पोपा ।

 

अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) – इनका निर्माण विभिन्न कारकों द्वारा अपरदन से होता है। उदाहरण- भारत के अरावली, नीलगिरि आदि।

पठार

साधारणतया अपने सीमावर्ती धरातल से पर्याप्त ऊँचे एवं सपाट तथा चौड़े शीर्ष भाग वाले स्थलरूप को ‘पठार’ के नाम से जाना जाता है। इनके निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-

अन्तरापर्वतीय पठार (Intermountane Plateau) – ऐसे पठार चारों ओर से घिरे रहते हैं। उदाहरण- तिब्बत का पठार, बोलीविया, पेरू इत्यादि के पठार।

पीडमॉण्ट पठार (Piedmont Plateau)– उच्च पर्वतों की तलहटी में स्थित पठारों को ‘पीडमॉण्ट’ पठार कहते हैं। उदाहरण – पीडमॉण्ट (सं. रा. अमेरिका), पेटागोनिया (दक्षिणी अमेरिका) आदि।

महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau) – ऐसे पठारों का निर्माण पटल विरूपणी बलों द्वारा धरातल के किसी विस्तृतभू-भाग के ऊपर उठ जाने से होता है। उदाहरण- भारत के कैमूर, राँची तथा कर्नाटक के पठार।

मरुस्थल

शुष्क जलवायु वाले प्रदेशों में पाये जाने वाले वे क्षेत्र जहाँ वर्षा कम या नहीं के बराबर होती है एवं वनस्पतियां नहीं उगती हैं, मरुस्थल कहलाते हैं। ऐसे प्रदेशों में बालुकाभित्ति, कंकड़-पत्थर एवं चट्टान की अधिकता रहती है। मरुस्थल निम्न प्रकार के होते हैं-

वास्तविक मरुस्थल- इसमें बालू की प्रचुरता पाई जाती है।

पथरीले मरुस्थल– इसमें कंकड़-पत्थर से युक्त भूमि पाई जाती है। इन्हें अल्जीरिया में रेग तथा लीबिया में सेरिर के नाम से जाना जाता है।

चट्टानी मरुस्थल- इनमें चट्टानी भूमि का हिस्सा अधिकाधिक होता है। इन्हें सहारा क्षेत्र में हमादा कहा जाता है।

ज्वालामुखी 

ज्वालामुखी का तात्पर्य उस छिद्र व दरार से होता है जिसके माध्यम से पृथ्वी के आंतरिक भाग में स्थित लावा तथा अन्य पदार्थ धरातल के ऊपर आते हैं। सामान्य रूप से ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं-

जाग्रत ज्वालामुखी (Active Volcano)- इस प्रकार के ज्वालामुखी से लावा, गैसों इत्यादि का लगातार उद्गार होता रहता है। उदाहरण- इटली के एटना तथा स्ट्रॉमबोली।

प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano)- जिन ज्वालामुखियों में शांतकाल के पश्चात् अचानक उद्गार होता है, उन्हें प्रसुप्त ज्वालामुखी कहते हैं। उदाहरण- इटली का विसूवियस।

शांत ज्वालामुखी (Extinct Volcano)- ये वे ज्वालामुखी हैं  जिनके भविष्य में उद्गार की कोई संभावना नहीं रहती है। उदाहरण- ईरान के कोल सुल्तान व म्यांमार का पोपा आदि।

झील

महाद्वीपों के मध्यवर्ती भाग अर्थात धरातल पर उपस्थित जलपूर्ण भागों को झील  कहते हैं। झीलों की सबसे बड़ी विशेषता उनका स्थल से घिरा होना है। झील निम्न प्रकार की होती हैं-

खारे पानी की झीलें– जिन झीलों में बाहर से पानी आकर मिलता तो है किन्तु निकलकर बाहर नहीं जाता है, वे प्राय: खारी झीलें होती हैं। कैस्पियन सागर विश्व की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है।

ताजे या मीठे पानी की झीलें– वे झीलें  जिनमें नदियों के माध्यम से निरंतर ताजे जल का प्रवाह होता रहता है मीठे पानी की झीलें होती हैं क्योंकि इनमें विभिन्न प्रकार के लवणों का जमाव नहीं होने पाता है। भारत में नैनीताल, भीमताल, कोडाईकनाल आदि मीठे पानी की प्रमुख झीलें हैं।

विवर्तनिक झीलें– भूभर्गिक हलचलों के कारण निर्मित झीलों को विवर्तनिक झीलों के अंतर्गत रखा जाता है।

भ्रंशन द्वारा बनी झीलें– भूगर्भिक हलचलों के कारण धरातल के किसी भाग के नीचे धंस जाने या ऊपर उठ जाने से बनी बेसिनों में जल भर जाने के परिणामस्वरूप ऐसी झीलों का निर्माण होता है।

दरार घाटी झीलें– धरातल की दो समानांतर दरारों के मध्यवर्ती भाग के नीचे धंस जाने एवं उसमें जल भर जाने के फलस्वरूप ऐसी झीलों का निर्माण होता है। इजरायल का मृत सागर इसका उदाहरण है।

क्रेटर झीलें– शांत ज्वालामुखियों के वृहदाकार मुखों या के्रटरों में जल भर जाने से ऐसी झीलों की उत्पत्ति होती है। इसका प्रमुख उदाहरण अफ्रीका की विक्टोरिया झील है।

हिमनद

हिमनद बर्फ का एक विशाल संग्रह होता है, जो निम्न भूमि की ओर धीर-धीरे बढ़ता है। ये तीन तरह के होते हैं-

(1) गिरिपद हिमनद

(2) महाद्वीपीय हिमनद

(3) घाटी हिमनद।

नदी की तरह से हिमनद भी अपरदन, परिवहन और निक्षेपण का कार्य करते हैं। अपरदन के अंतर्गत यह उत्पादन, अपकर्षण और प्रसर्पण का कार्य करते हैं।

मैदान

धरातल पर मिलने वाले अपेक्षाकृत समतल और निम्न भू-भाग को मैदान कहा जाता है। इनका ढाल एकदम न्यून होता है। निर्माण की प्रक्रिया के आकार के आधार पर मैदानों के प्रकार निम्नलिखित हैं-

रचनात्मक मैदान (structural Plains)- रचनात्मक मैदानों का निर्माण पटल विरुपणी बलों के परिणामस्वरूप समुद्री भागों में निक्षेपित जमावों के ऊपर उठाने से होता है। उदाहरण- कोरोमण्डल व उत्तरी सरकार (भारत)।

अपरदनात्मक मैदान (Erosional Plains)- ऐसे मैदानों का निर्माण अपक्षय तथा अपरदन की क्रियाओं के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- उत्तरी कनाडा, उत्तरी यूरोप, पश्चिमी सर्बिया आदि।

निक्षेपात्मक मैदान (Depositional plains)- अपरदन के कारकों द्वारा धरातल के किसी भाग से अपरदित पदार्थों को परिवहित करके उन्हें दूसरे स्थान पर निक्षेपित कर देने से ऐसे मैदानों की उत्पत्ति होती है। उदाहरण- गंगा-ब्रह्मïपुत्र का मैदान (उत्तर भारत), ह्वांगो (चीन) आदि।

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