चोल, चेरा और पाण्ड्या राजवंश

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By DoThe Best September 10, 2015 10:32

दक्षिण भारतीय की तीन राजवंशों के बारे में विवरण नीचे दिया गया है :

चेरा राजवंश

चेरा राजवंशों ने दो विभिन्न कालों में शासन किया | प्रथम चेरा राजवंशों ने संगम युग में शासन किया  जबकि द्वितीय चेरा राजवंश ने 9वीं शताब्दी A D के आगे शासन किया |हमें चेरा राजवंश के बारे में संगम लेख के द्वारा पता चलता है | चेराओं द्वारा शासित क्षेत्रों में कोचीन, उत्तर त्रावणकोर और दक्षिणी मलाबार थे | इनकी राजधानी किज़्हंथुर –कंदल्लुर और करूर-वांची में वांची मुथुर थी | बाद के चेराओं की राजधानी कुलशेकरपुरम और महोदयापुरम थी | इनका  राजचिन्ह धनुष व तीर था | इनके द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर धनुष यंत्र का चिन्ह अंकित होता था |

उठियान चेराला

इसे चेरा के प्रथम राजा के रूप मे दर्ज़ किया गया है | चोलाओं से हारने के बाद उसने आत्महत्या कर ली |

सेंगुत्तुवन इस राजवंशों का सबसे प्रसिद्ध शासक था | वह प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलापथिकरम का नायक था | इसने दक्षिण भारत से चीन को प्रथम राजदूत भेजा था | इसकी राजधानी करूर थी | इसकी जलसेना विश्व में सर्वोत्तम थी |

द्वितीय चेरा राजवंश

कुलशेखारा अलवर ने द्वितीय चेरा राजवंश की स्थापना की | इसकी राजधानी महोदयापुरम थी | द्वितीय चेरा राजवंश का रामा वर्मा कुलशेखरा अंतिम राजा था | इसने 1090 से 1102 A D तक शासन किया | इसके बाद चेरा राजवंश समाप्त हो गया |

चोल राजवंशों ने 300 B C से 13वीं शताब्दी के बाद तक शासन किया जबकि उनके प्रदेश बदलते रहे |  इनके शासन काल को तीन भागों मे विभाजित किया जा सकता है नामतः पूर्व चोल, मध्यकालीन चोल व बाद के चोला |

चोल राजवंश

पूर्व चोल

पूर्व चोलाओं के बारे में  ज़्यादातर जानकारी संगम साहित्य से मिली हैं | अन्य जानकारी हमें महावमसा , सीलॉन का बौद्ध लेख , अशोक के स्तंभों और एर्यथ्रेयान समुद्र के पेरिप्लुस से मिलती है |

कारिकला चोल पूर्व चोल का सबसे प्रसिद्ध राजा है | इसने 270 B C के लगभग शासन किया | इसने वेन्नी की मशहूर लड़ाई जीती जिसमे इसने पाण्ड्य और चेराओं को धोखे से हराया था | यह माना जाता है कि इसने पूर्ण सीलॉन को जीत किया था |

परंतु राजा होने के नाते इसने कावेरी नदी के कल्लानाइ पर पठार में विश्व का पहला जल नियंत्रक भवन बनाया था जो कि बहुत महत्वपूर्ण कार्य था | यह खेतीबाड़ी के मकसद से बनाया गया था |

मध्यकालीन चोल

चोलाओं ने अपनी शक्ति को 848 A D में पुनः प्रचलित किया और इनका शासन काल तीसरी शताब्दी A D से 9वीं शताब्दी A D के लंबी रुकावट के बाद दुबारा स्थापित हुआ | इसकी अपनी राजधानी थंजौर थी | यह पल्लवा का जागीरदार था | इसने पादुकोट्टाई मे सोलेसवारा मंदिर का निर्माण किया |

विजयालया चोल

मध्यकालीन का प्रथम चोल शासक विजयालया चोल था जिसे चोल शासन को पुनः स्थापित करने का  श्रेय जाता है| विजयालया की अपनी राजधानी थंजौर में थी | वह पल्लावाओं का दास था | इसने पादुकोट्टई में सोलेसवरा मंदिर बनाया |

अदित्या चोल 1

विजयालया का बेटा, अदित्या चोल उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी बना | शिव का बड़ा भक्त होने के कारण इसने कावेरी नदी के किनारों पर काफी शिव मंदिरों का निर्माण किया |

परांतका चोल 1

इसने पाण्ड्य राजा को हराया और मदुरकोण्डा का खिताब धारण किया |

राजराजा चोल 1

कुछ कम जानकार राजाओं के बाद, राजराजा चोल 1 ने राजगद्दी संभाली | इसका नाम जन्म के समय अरुल्मोज़्हि वर्मन था | इसे अरुन्मोज़्हि उदयर पेरिया उदयर के नाम से भी  जाना जाता है | इसके समय चोल साम्राज्य ने पूरा तमिलनाडु , कर्नाटक, उड़ीसा के भाग और आंध्र प्रदेश, पूर्ण केरल और श्रीलंका  को समाविष्ट कर लिया | राजराजा चोल 1 ने  थंजौर में राजराजेश्वरम मंदिर का निर्माण किया जो  अब यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह मंदिर पेरुवुडाइयर कोविल या बृहदीस्वरर मंदिर के नाम से जाना जाता है |

राजेंद्र चोल 1

राजराज चोल1 के बाद 1014 A D मे इसका बेटा राजेंद्र चोल1 उत्तराधिकारी बना जिसने 1044 A D तक शासन किया | वह राजराज चोल1 से भी  ज्यादा  महत्वाकांशी था | इसके मुख्य आक्रमण और विजय निम्न है :

  • इसने पूर्ण श्रीलंका को जीत किया और उसके राजा को 12 साल तक बंदी बनाए रखा |
  • पश्चिमी चौलक्य सम्राट को मसकी के युद्ध मे हारने के बाद पूर्वी चौलक्य को भी ज़बरदस्ती आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया |
  • इसकी सेनाओं ने कलिंग, पाल और गंगस पर विजय प्राप्त कि और इसने इससे गंगाईकोण्डा की उपाधि दी |
  • उल्लेखनीय ढंग से राजेंद्र 1की जल सेना ने मालया और सुमात्रा राज्यों को पराजित किया तथा केदाह पर कब्ज़ा कर लिया |
  • राजेंद्र चोल-1 ने चोल साम्राज्य की नई राजधानी गंगाईकोण्डा चोलपुरम, कलिंग , पल और गंगस के ऊपर विजय दर्शाने के लिए बनाई |

राजाधिराज चोल

राजेंद्र चोल-1 का उत्तराधिकारी राजाधिराज था | यह मैसूर के निकट कोप्पम के युद्ध मे मारा गया |

राजेन्द्र चोल-II

कविता और नृत्य का महान संरक्षक, इसने अपना समर्थन संगीत नृत्य नाटिका राजराजेस्वर नाटकम को दिया |

विराराजेन्द्र चोल

एक प्रभावकारी शासक जिसका शासन 1063-1070 A D तक था | वह राजेन्द्र चोल का छोटा भाई था | वह एक महान योद्धा के साथ साथ कला का महान प्रशंसक था |

इसके बाद अथिराजेन्द्र चोल के द्वारा पदभार संभाला गया जो अपने राज्य की रक्षा करने में ज्यादा शक्तिशाली नहीं था | उसके शासन में राष्ट्र विद्रोह हुआ जिसमे वह मारा गया | इसकी मृत्यु के बाद मध्यकालीन चोल राजवंश समाप्त हो गया |

बाद के चोल

बाद के चोलाओं का शासन काल 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक, चोल साम्राज्य ने शिखर को प्राप्त किया और विश्व का  सबसे शक्तिशाली देश बन गया | चोलाओं ने दक्षिण पूर्व एशियन देश पर कब्ज़ा कर लिया और उस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना व जल सेना थी |

पाण्ड्य साम्राज्य 

पाण्ड्य राज्य दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित था | यह लगभग 6ठी शताब्दी B C में शुरू हुआ और लगभग 15वीं शताब्दी A D  में समाप्त हो गया |

पाण्ड्य राज्य  का संगम युग मे विकसित आज के मदुरै के जिले, तिरुनेल्वेली, तमिलनाडू में रामनद के साथ बढ़ा | मदुरै राजधानी शहर था और कोरकाई राज्य का मुख्य पोत था जोकि व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बना | संगम साहित्य पाण्ड्य राजाओं की लंबी सूची बताता है जिसमें  कई राजा  बहुत प्रसिद्ध हुए | मधूकुदुमी ने अपनी जीत को मनाने के लिए कई बलिदान दिये | इसलिए , इसे पल्यागसलाई की उपाधि दी गई |

एक दूसरा पाण्ड्य राजा बूथा पंडिया एक महान योद्धा था और तमिल कवियों का प्रशंसक भी था | आरियाप्पडाइकदंथा नेडुंजेलियन भी एक प्रसिद्ध पाण्ड्य शासक थे | उन्होने सिलप्पाथिगरम (महाकाव्य) के नायक को गलती से मृत्युदंड दे दिया था जिसका सच जानने पर उन्होने अपना जीवन त्याग दिया |

एक अन्य महत्वपुर्ण शासक थालाइयलंगनथु नेदुंजेल्लियन था जिसका शासन लगभग 210 A D  तक रहा जिसने चेरा, चोल और पाँच अन्य छोटे राज्यों की संघटित सेना को थलाइयलंगनम नामक जगह पर पराजित किया, जिसका व्याख्या 10 वीं सदी के अभिलेख में की गई है | इसने कई तमिल कवियों को आश्रेय दिया जिसमे मंगुड़ी मरुथनर भी थे | पाण्ड्य राज्य का  रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार था जिसने व्यापारियों को लाभान्वित किया और राज्य को धन संपन्न और खुशहाल बनाया | जतवर्मन सुंदरा पाण्ड्य ने पाण्ड्य साम्राज्य पर 1251-61 A D तक शासन किया जिसे श्रीलंका के द्वीपों को जीतने की वजह से “द्वितीय राम” कहा गया |

पाण्ड्य का शासन 14वीं शताब्दी के शुरुआत से खत्म होने लगा जब राजगद्दी के उत्तराधिकारियों के दावे  लिए मतभेद शुरू हो गए और एक दावेदार ने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी,से मदद मांगी जिसका नतीजा मलिक काफ़ुर के नेतृत्व में सुलतान का आक्रमण था | मुस्लिम आक्रमण की वजह से पाण्ड्यों का सफाया हो गया |

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