लोधी वंश के पतन के कारण

DoThe Best
By DoThe Best October 17, 2015 14:08

लोधी साम्राज्य की स्थापना अफगानों की गजली जनजाति ने की थी। कहा जाता है कि बहलुल लोधी ने बुद्धिमानी से काम किया और उसने सैय्यदों की कमजोर स्थिति का लाभ उठाते हुए दिल्ली पहुंचने से पहले पंजाब पर कब्जा कर लिया था। उसने 19 अप्रैल 1451 को “बहलुल शाह गाजी” के खिताब के साथ दिल्ली के सिंहासन से भारत का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया. उसके गद्दी पर बैठने के बाद शर्की वंश का दमन हो गया।

तथ्यों के अनुसार लोधी शासन के दौरान भारत में बड़े पैमाने पर अफगानों के आने की वजह से लोधी वंश ने अपनी खोई शक्तियां फिर से हासिल कर ली थी। बहलुल लोधी ने अपना साम्राज्य ग्वालियर, जौनपुर और उत्तरी उत्तर प्रदेश तक फैला लिया था और अपने सबसे बड़े बेटे बरबक शाह को जौनपुर का शासक नियुक्त कर दिया था। वह योग्य प्रशासक था, जिसने लगातार 26 वर्षों तक दिल्ली के आस– पास के प्रदेशों पर जीत हासिल की थी। 1488 ई. में जलाली में उसका निधन हो गया। दक्षिण दिल्ली के चिराग दिल्ली में आज भी उसकी कब्र मौजूद है।

बहलुल लोधी के दूसरे बेटे सिकंदर लोधी का अपने बड़े भाई बरबक शाह के साथ सत्ता संघर्ष लगातार जारी था। सिकंदर लोधी 5 जुलाई 1489 को बहलुल लोधी का उत्तराधिकारी बन गया। सिकंदर लोधी को इतिहास में सच्चा कट्टरपंथी सुन्नी शासक कहा गया है जिसने मथुरा और नागा बंदरगाह पर भारतीय मंदिरों का विध्वंस करवाया था। उसने इस्लाम की सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए हिन्दुओं पर जजिया लगाया था। उसने 32 अंकों के गाज–ए– सिकंदरी की शुरुआत की जो किसानों को उनके द्वारा जोती गए जमीन को मापने में मदद करता था।

इतिहास में इसे निम्नलिखित कारणों की वजह से जाना जाता हैः 

  • 1504 ई में आगरा शहर की स्थापना और खूबसूरत कब्रों एवं इमारतों के निर्माण।
  • उसने आयात और निर्यात को सुगम बनाने एवं अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • किसानों को खाद्यान्न पर कर देने से छूट दी।
  • शिक्षा को बढ़ावा दिया।
  • सिकंदर एक कट्ट सुन्नी शासक था जिसमें धार्मिक सहिष्णुता का अभाव था।

सिकंदर लोधी ने ग्वालियर के किले पर फतह के लिए पांच बार कोशिश की लेकिन हर बार राजा मान सिंह से उसे मुंह की खानी पड़ी।

1517 ई. में उसका निधन हो गया और उसके बाद उसका बेटा इब्राहिम खान लोधी, बड़े भाई जलाल–उद–दीन के साथ उत्तराधिकारी के लिए हुए युद्ध में जीत हासिल कर, दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। दोनों भाइयों के बीच हमेशा युद्ध की स्थिति बनी रहती थी।

लोधी वंश का पतन

इब्राहिम लोधी की ताजपोशी ने एक दशक के भीतर ही लोधी साम्राज्य को बहुत नीचे ला दिया था. इसके मुख्य कारण थेः

  • जलाल–उद– दीन का समर्थन करने वाले अफगानी रईसों के बीच असंतोष. अपने भाई के प्रति नफरत की वजह से इब्राहिम लोधी ने इन पर बहुत अत्याचर किए।
  • प्रशासनिक प्रणालियों की विफलता और व्यापार मार्गों का अवरुद्ध होना जिसकी वजह से साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमारा गई थी।
  • लोधी सेना पर राजपूत राजाओं का खतरा और उनके द्वारा दी जाने वाली धमकियां।
  • बुरी आर्थिक स्थिति और उत्तराधिकार के लिए होने वाले लगातार युद्ध की वजह से राजकोष में तेजी से कमी. नतीजतन साम्राज्य कमजोर होता गया।
  • आंतरिक युद्ध जिसने साम्राज्य को कमजोर बना दिया और लोधी वंश जहीर उद दीन मोहम्मह बाबर के हाथों में चला गया जिसने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोधी को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की।
  • लोधी साम्राज्य बड़ा हो रहा था लेकिन उसमें संचार साधनों की कमी थी जिसकी वजह से समय और प्रयासों की बर्बादी होने लगी थी। राजा की योग्यता पर से लोगों का विश्वास खोता जा रहा था।
  • इस अवधि के दौरान गुलामों की संख्या बढ़ रही थी और इन गुलामों के रखरखाव में राजकोष पर बोझ बढ़ता जा रहा था।
  • उत्तराधिकार की लड़ाई में कोई निश्चित कानून नहीं बनाया गया था। कोई भी युद्ध शुरु कर सकता था और किसी भी साम्राज्य पर अपना अधिकार स्थापित कर सकता था।
  • अभिजात वर्गों का लालच और अक्षमता ने सैन्य संगठनों को कमजोर और निष्प्रभावी बना दिया था।
  • इस प्रकार की सैन्य सरकार से लोगों के लगातार कम होते भरोसे ने भी वंश के पतन में योगदान दिया।
  • तैमूर द्वारा किए जाने वाले नियमित आक्रमणों ने भी सैन्य क्षमताओं को कमजोर कर दिया था।

इब्राहिम लोधी के सख्त नियमों ने उसके कई गुप्त शत्रु पैदा कर दिए थे। उनमें से एक प्रमुख शत्रु उसका चाचा और लाहौर का शासक था जिसने इब्राहीम द्वारा किए गए अपमान का बदला लेने के लिए इब्राहीम को धोखा दिया और बाबर को लोधी साम्राज्य पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। बाबर ने इब्राहीम को पानीपत की पहली लड़ाई में हरा दिया और इस तरह 1526 ई.  में लोधी वंश के 75 वर्षों के शासन का कड़वा अंत हो गया।

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