भारतीय सिनेमा

DoThe Best
By DoThe Best July 28, 2015 13:43

भारतीय सिनेमा का कारवां जो ब्लेक एंड व्हाइट से शुरु हुआ था, आज कामयाबी के साथ 100 साल ज्यादा का समय पूरा कर चुका है। इस सफ़र में कुछ फ़िल्मों ने दिल छू लिया, तो कुछ फ़िल्मों ने जिन्दगी के तनाव से उबरने में मदद की। कुछ फ़िल्में ऐसी भी रहीं, जिन्होंने विदेश में भी धूम मचाई। छोटे से प्रयास से शुरू हुई यह फ़िल्मी दुनिया आज विशाल उद्योग का रुप ले चुकी है। इस फ़िल्मी दुनिया के अब तक कुछ ऐसे माइल स्टोन रहे हैं जिनकी वजह से भारतीय सिनेमा में नए बदलाव आए हैं। हम यहां कुछ खास बातों की चर्चा करेंगे।

पहली फ़िल्म : धुंदीराज गोविंद फाल्के, ‘जिन्हें दादा साहेब फाल्के के नाम से जाना जाता है’, ने “राजा हरिशचंद्र” जो देश की पहली फ़िल्म थी सन 1913 में बनकर तैयार हुई थी और 3 मई 1913 को प्रदर्शित हुई थी। इस फ़िल्म का एक ही प्रिन्ट बना था। लेकिन इस फ़िल्म में शब्द नहीं थे। और इस तरह, इस blank and white फ़िल्म से भारतीय सिनेमा के सफ़र की शुरुआत हुई। लेकिन ये याद रहें कि उस समय फिल्मों में काम करना ठीक नहीं समझा जाता था फिर भी सन 1930 तक करीब 1300 मूक फिल्में बनी थी।

पहली बोलती फ़िल्म: निर्देशक अर्देशिर ईरानी ने 1931में पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ का निर्माण किया। राजकुमार (प्रिंस) और जिप्सी गर्ल की प्रेम कहानी पर बनी यह फ़िल्म पारसी नाटक पर आधारित थी। यह फ़िल्म और इसका संगीत काफी प्रसिद्ध हुआ था।

पहली रंगीन फिल्म: वर्ष 1937 में मोती गिडवानी ने एक फिल्म ‘किसान कन्या’ का निर्माण किया था जो कि भारतीय सिनेमा की पहली रंगीन फिल्म थी। इसको अर्देशिर ने ही प्रस्तूत किया था। फिल्म एक गरीब किसान और उसकी परेशानियों पर आधारित थी। और इस फिल्म से ही रंगीन फिल्मो का दौर शुरु हुआ।

पर्दे पर प्यार:  वर्ष 1933 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘कर्मा’ में पहली बार पर्दे पर चुम्बन का द्र्श्य दिखाया गया था। फिल्म अभिनेत्री देविका रानी ने वास्तविक जीवन में अपने पति हिमांशु राय को किस किया था। उस समय इस द्र्श्य की काफी चर्चा हुई थी, क्योंकि इस तरह का यह पहला सीन था।

पहला कान पुरस्कार : फिल्म “नीचा नगर” पहली भारतीय फिल्म थी, जिसे पहला कान फिल्म फेस्टिवल (1946) में ‘पाल्म डि ओर’ अवार्ड दिया गया था। फिल्म का निर्देशन चेतन आनंद ने किया था जिसमें उमा आनंद, कामिनी कौशल, जोहरा सहगल ने अभिनय किया था।

नया रिकार्ड: 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मदर इंडिया’ को विदेशी श्रेणी में आँस्कर के लिये नामित किया गया। हाँलांकि इसे यह अवार्ड नहीं मिल सका, लेकिन मेहबूब खान की इस फ़िल्म ने सफ़लता के कई रिकार्ड कायम किये है।

पहली आँस्कर पुरस्कार विजेता फ़िल्म: भारतीय सिनेमा ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान कायम की है। पिछले 100 वर्षों से लगातार बाँलीवुड दमदार फिल्में दे रहा है, लेकिन इसके बावजूद फिल्मी दुनिया का सबसे बड़ा अवार्ड ‘आस्कर’ अब तक नहीं मिला है। अब तक अधिकारिक तौर पर 45 फिल्में आँस्कर के लिये भेजी जा चुकी है। जिनमें से ‘मदर इंडिया’ (1957), ‘सलाम बाम्बे’ (1988), और ‘लगान’ (2001) ही ‘उत्त्म विदेशी भाषा फिल्म’ की श्रेणी में आस्कर के लिये नांमाकित हो सकी है। हांलाकि विभिन्न श्रेणियों में भारतियों ने आस्कर लेकर नाम रोशन किया है। 1982 में काँस्ट्यूम डिजाइनर भानू अथैया को पहला आस्कर फिल्म ‘गांधी’ में उनकी ओर से डिजाइन किए गए कास्ट्युम के लिए मिला था। ये भारत के लिए बडे गर्व की बात थी। इसके बाद सत्यजीत रे को आस्कर में प्रतिष्ठित एकेडमी अवार्ड दिया गया। साल 2008 में विदेशी फिल्म ‘स्लमडाँग मिलेनियर’ के लिये ए आर रहमान (बेस्ट म्युजिक), गुलजार (बेस्ट साँन्ग लिरिक्स) और रेसूल पोकुट्टी (बेस्ट साँन्ग मिक्सिंग) को आस्कर मिला। इसके अलावा कुछ अन्य प्रमुख नामांकन इनके हुए है:

मधुमती (1958), द गाइड (1965), रेशमा और शेरा (1971), मंथन (1977), सरांश (1984), परिंदा (1989), रुदाली (1993), अर्थ (1999), देवदास (2002), रंग दे बसंती (2006), पीपली लाइव (2010), बर्फी (2012)।

अब तक की सबसे सफल (All time Hit): सन 1975 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘शोले’ जिसने सफ़लता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे, सौ सिनेमा हालों में सिल्वर जुबली मनाने वाली पहली भारतीय फिल्म थी। रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी मशहूर लेखक सलीम खान ने। इस फिल्म में धर्मेन्द्र, अमिताभ, संजीव कुमार, अमजद खान, हेमा मालिनी, जया भादुड़ी आदि कलाकारों ने अभिनय किया था।

 

पहली 3डी फिल्म(First 3D movie):

मलयालम फिल्म ‘माय डियर कुट्टीचेतन’ की हिन्दी में डब्ड फिल्म ‘छोटा चेतन’ पहली भारतीय 3डी फ़िल्म थी। और इसे काफी सफलता भी मिली थी। यह बच्चों को बहुत पसंद आयी थी।

 

स्टिल रनिंग: शाहरुख खान और काजोल अभिनीत फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ सिनेमा जगत की सबसे लम्बे समय तक चलने वाली फ़िल्म हैं। यह आज भी मुम्बई के सिनेमा हाल ‘मराठा मंदिर’ में चल रही है। इस फिल्म को आदित्य चोपड़ा ने सन 1995 में बनाया था। यह भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की सबसे लम्बे समय तक सिनेमा के पर्दे पर दिखाई जाने वाली फ़िल्म हैं। इससे पहले यह कीर्तिमान फ़िल्म ‘शोले’ के नाम था।

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