लाला लाजपत राय का जीवन और भारतीय इतिहास में उनका स्थान

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By DoThe Best January 11, 2018 17:23

लाला लाजपत राय का जीवन और भारतीय इतिहास में उनका स्थान

लाला लाजपत राय का जीवन और भारतीय इतिहास में उनका स्थान

कांग्रेस के उग्रवादी नेताओं में लाला लाजपत राय का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है. तिलक की ही भाँति पंजाब में लाला लाजपत राय ने नयी सामाजिक और राजनीतिक चेतना लाने की कोशिश की. पंजाब के रहने वाले लोग लाला लाजपत राय को श्रद्धा से “पंजाब केसरी (Punjab Kesari)” कहते थे.

लाला लाजपत राय की जीवन

लाला लाजपत राय का जन्म 1865 ई. में पंजाब में हुआ था. उनके पिता स्कूल-इंस्पेक्टर थे. लाला लाजपत बचपन से ही प्रखर बुद्धि के थे. उन्हें प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति से बहुत लगाव था. इसी लगाव के चलते ही उन्होंने प्राचीन विद्या, धर्म और संस्कृति का गहन रूप से अध्ययन किया. वे भी विदेशी शासन के विरोधी थे. उनका राजनीतिक दर्शन दयानंद सरस्वती के दर्शन से प्रभावित था. अपनी शिक्षा ख़त्म कर के वे सक्रिय रूप से राजनीति में संग्लन हो गए.

इतिहास में से लाला लाजपत का स्थान

1888 ई. में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की. वे कांग्रेसी के नरमपंथी नेताओं और कांग्रेस की भिक्षा की नीति से काफी असंतुष्ट थे. तिलक के सामान वे भी उग्र राष्ट्रवादिता के हिमायती थी. जल्द ही तिलक और बिपिनचंद्र पाल के साथ उन्होंने अपना उग्रवादी गुट बना लिया जिसे लाल-बाल-पाल  के नाम से जाना गया. इन लोगोंने कांफ्रेस की शांतिपूर्ण नीतियों का विरोधरंभ किया. फलतः, कांग्रेस के अन्दर नरमपंथियों का प्रभाव कम होने लगा और उग्रवादियों का प्रभाव बढ़ने लगा. बनारस कांग्रेस अधिवेशन (1905 ई.) में उग्रवादियों ने कांग्रेस पंडाल में भी अलग बैठक की. लाजपत राय ने भी इसमें भाग लिया. उन्होंने कहा कि अगर “भारत स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है तो उसको भिक्षावृत्ति का परित्याग कर स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा.

कांग्रेस से अलग

1907 ई. में कांग्रेस के विभाजन के बाद लाला लाजपत राय कांग्रेस से अलग हो गए. कांग्रेस से अलग होकर इसी वर्ष उन्होंने पंजाब में “उपनिवेशीकरण अधिनियम” के विरोध में एक व्यापक आन्दोलन चालाया. लाला हरदयाल के साथ मिलकर उन्होंने क्रांतिकारी आन्दोलनों में भी भाग लिया. फलतः सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर भारत से निर्वासित कर दिया. निर्वासन के बाद लाजपत राय अमेरिका चले गए और वहीं से राष्ट्रीय आन्दोलन और अंग्रेजी सरकार विरोधी गतिविधियों में भाग लेते रहे. उन्होंने भारत की दयनीय स्थिति से सम्बंधित एक पुस्तक की रचना भी की जिसे सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया.

भारत पुनर्वापसी

1920 ई. में लाला लाजपत राय पुनः भारत वापस आये. उस समय सम्पूर्ण देश महात्मा गान्धी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन की तैयारी कर रहा था. जब गांधी ने अपना आन्दोलन शुरू कियाअ लाजपत राय नेइन भाग लिया और पंजाब में इसे सफल किया. उनके कार्यों से क्रोधित होकर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जेल से छूटने के बाद वे फिर से राजनीति में सक्रिय हो उठे. 1923 ई. में वे केन्द्रीय सभा के सदस्य निर्वाचित हुए.

वे स्वराज दल के सदस्य भी बने परन्तु बाद में इससे अलग होकर एक राष्ट्रीय दल की स्थापना उन्होंने की. 1925 ई. में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का सभापति बनाया गया. 1928 ई. में जब साइमन कमीशन के बहिष्कार की योजना बनाई गई तो लाला ने भी उसमें भाग लिया. उन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन विरोधी जुलूस का नेतृत्व किया. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसायी. इससे लाला लाजपत राय को सर पर चोट लगी. इसी चोट की वजह से 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई. उनकी असामयिक मृत्यु से पूरा देश स्तब्ध रह गया. भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में लाला लाजपत राय का बहुमूल्य योगदान है.

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