उत्तरकालीन वैदिक युग में आर्थिक व सामाजिक जीवन

DoThe Best
By DoThe Best September 7, 2015 11:43

प्रधान भाग : वह काल जिसने ऋग वैदिक युग का अनुसरण किया वह उत्तरकालीन वैदिक के नाम से जाना गया |

I. उत्तरकालीन युग में आर्थिक जीवन

• वैदिक लेखों में समुद्र व समुद्री यात्राओं का उल्लेख है | यह ये दर्शाता है कि वर्तमान का समुद्री व्यापार आर्यन के द्वारा शुरुं किया गया था |
• धन उधार  देना एक फलता फूलता व्यापार था | श्रेस्थिन शब्द यह बताता है कि  इस युग में सम्पन्न व्यापारी थे और शायद वे सभा के रूप में संगठित थे |
• आर्यन ने सिक्कों का प्रयोग नहीं किया परंतु सोने की मुद्राओं के लिए विशेष सोने के वज़नों का प्रयोग किया गया | सतमाना, निष्का, कौशांभी, काशी और विदेहा प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र थे |
• जमीन पर बैल गाड़ी का प्रयोग सामान ले जाने के  लिए किया जाता था |विदेशी सामान के लिए नावों और समुद्री जहाजों का प्रयोग किया जाता था |
• चाँदी का इस्तेमाल बढ़ गया था और उससे आभूषण बनाए जाते थे |

II. उत्तरकालीन वैदिक युग में सामाजिक जीवन

• समाज 4 वर्णों  में विभाजित था : ब्राह्मण, राजन्य या क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र |
• प्रत्येक वर्ण का अपना कार्य निर्धारित था जिसे वे पूरे रीति रिवाज के साथ करते थे | हर एक को जन्म से ही वर्ण दे दिया जाता था |
• गुरुओं के 16 वर्गों मे से एक ब्राह्मण होते थे परंतु बाद में दूसरे संत दलों से भी श्रेष्ठ हो जाते थे | इन्हे सभी वर्गों में सबसे शुद्ध माना जाता था और ये लोग अपने तथा दूसरों के लिए बलिदान जैसी क्रियाएँ  करते थे |
• क्षत्रिय शासकों और राजाओं के वर्ग में आते थे और उनका कार्य लोगों की रक्षा करना और साथ ही साथ समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना होता था |
• वैश्य लोग आम लोग होते थे जो व्यापार, खेतीबाड़ी और पशु पालना इत्यादि का कार्य करते थे | मुख्यतः यही लोग कर अदा करते थे |
• यद्यपि सभी तीनों वर्णों को उच्च स्थान मिला था और ये सभी पवित्र धागे को धारण कर सकते थे, पर शूद्रों को ये सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं और इनसे भेदभाव किया जाता था |
• पैतृक धन पित्रसत्तात्मक का नियम था जैसे चल अचल संपत्ति पिता से बेटे को चली जाती थी | औरतों को ज़्यादातर निचला स्थान दिया जाता था | लोगों ने गोत्र असवारन विवाह का चलन चलाया |एक ही गोत्र के या एक ही पूर्वजों के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते थे |
वैदिक लेखों के अनुसार जीवन के चार चरण या आश्रम थे :ब्रह्मचारी या विद्यार्थी, गृहस्थ, वनप्रस्थ या आधी निवृत्ति और सन्यास या पूर्ण निवृत्ति |

III. प्रशासन की व्यवस्था
• पूर्व वैदिक आर्यन जाति में संगठित रहते थे ना की राज्यों के रूप में | जाति के मुखिया को राजन कहते थे | राजन की अपनी स्वायत्तता उसकी जाति की सभा में प्रतिबंधित थी जिसे सभा या समिति कहा जाता था |
• राजन उनकी सहमति के बिना सिंहासन पर नहीं बैठ सकता था | सभा, जाति के कुछ प्रमुख लोगों की होती थी जबकि समिति में जाति का हर एक आदमी होता था |
• कुछ जातियों के वंशानुगत  मुखिया नहीं होते थे और इन्हे जातिय सभा की सरकार द्वारा चलाया जाता था | राजन की  प्राथमिक अदालत होती थी जिसमे उसकी जाति के सांसद और जाति के मुख्य लोग (ग्रामणि ) शामिल होते थे |
• राजन का मुख्य कार्य अपनी जाति की रक्षा करना था | उसकी सहायता उसके कई अधिकारियों द्वारा की जाति थी जिसमे पुरोहित, सेनानी(सेना का प्रमुख), दूत और जासूस शामिल थे |पुरोहित समारोह करते थे तथा युद्ध में जीत के लिए और शांति बनाए रखने के लिए मंत्रौच्चारण करते थे |
• राजन को समाज और जाति के संरक्षक के रूप में देखा जाता था| वंशानुगत शासन उभरना शुरू हुआ और जिसके फलस्वरूप प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई जैसे रथ दौड़, पशु की छाप और पासों का खेल जो की पहले निश्चय करते थे कि कौन राजा बनने योग्य है, बिलकुल भी महत्वपूर्ण नहीं  थे |इस युग के  रीति-रिवाज राजा के दर्जे को लोगों से ऊपर रखते थे | उसे प्रायः सम्राट कहा जाता था |
• राजन की बड़ी हुई राजनीतिक ताकतों ने  उसे उत्पादिक संसाधनों पर नियंत्रण करने की ताकत दे दी थी | ऐच्छिक रूप से दिया गया उपहार अनिवार्य भेंट बना दिया गया हालांकि कर के लिए कोई व्यवस्थित प्रणाली नहीं थी  |
• उत्तरकालीन वैदिक युग के अंत में, विभिन्न प्रकार की राजनीतिक ताकतों जैसे राज्य, गण राज्य और जातिय रियासतों का भारत में उत्थान हुआ |

IV. उत्तरकालीन वैदिक ईश्वर

• सबसे महत्वपूर्ण वैदिक ईश्वर, इंद्र और अग्नि ने अपनी महत्वता  खो दी और इनके स्थान पर प्रजापति, विधाता की पूजा होने लगी  |
• कुछ सूक्ष्म  भगवान जैसे रुद्र, पशुओं के देवता और विष्णु, मनुष्य का पालक और रक्षक प्रसिद्ध हो गए |

V. रीति-रिवाज और दर्शन शास्त्र 

• बलिदान, प्रार्थनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए और वे दोनों प्रजा और स्वदेशी को अपनाते थे  | जबकि लोग परिवार के बीच में ही बलिदान करते थे, जन बलिदान में राजा और उसकी प्रजा शामिल होते थे |
• यज्ञ या हवन करना उनके मुख्य धार्मिक कार्य होते थे | रोज़ाना के यज्ञ साधारण होते थे और परिवारों के बीच में ही होते थे |
• रोज़ के यज्ञों के अलावा वे त्योहार के दिनों में ख़ास यज्ञ करते थे | कभी कभार इन मौकों पर जानवरों का भी बलिदान दिया जाता था |

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