मुहम्मद बिन तुगलक

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By DoThe Best September 21, 2015 12:27

मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का बहुत ही विलक्षण एवं शानदार शासक था. वह न केवल बुद्धिमान  था बल्कि गणित और विज्ञान का जानकार था. इसके अलावा वह पर्सियन कविता का बहुत बड़ा प्रशंसक भी था. वास्तव में वह बहुत चालाक शासक था लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी की उसके पास धीरज नहीं था. साथ ही उसकी सोच उसके समय से बहुत आगे थी. उसने बहुत सारे विचारो पर मंथन किया लेकिन उन विचारो के क्रियान्वयन से जुड़े उसके पैमाने बहुत मजबूत और टिकाऊ नहीं थे इसीलिए वह असफल रहा. उसने अपने राज्य में मध्य राजधानी की स्थापना और टोकन करेंसी (प्रतीक मुद्रा) के रूप में विभिन्न प्रयोग किये लेकिन वह पूरी तरह से असफल रहा.

खुरासान और कराचिल अभियान

मुहम्मद बिन तुगलक की सबसे बड़ी योजना उसकी खुरासान अभियान(पर्सिया) और कराचिल अभियान (चीन) योजना थी. इस अभियान को क्रियान्वित करते समय मुहम्मद बिन तुगलक को एक व्यापक आपदापरक संकट का सामना करना पड़ा.

कर सुधार 

उपरोक्त योजना के अलावा उसकी कर सुधार से सम्बंधित योजना भी बहुत ही महत्वपूर्ण योजना थी. उसकी इस योजना ने दोआब क्षेत्र के किसानो के ऊपर कर का एक बड़ा बोझ लाद दिया जिसकी वजह से इस क्षेत्र में न केवल विद्रोह की स्थिति बनी बल्कि दोआब क्षेत्र में अकाल की स्थिति भी बन गयी और लोग भूखो मरने लगे.

राजधानी परिवर्तन

मुहम्मद बिन तुगलक को ऐसा लगाने लगा था कि दक्कन के क्षेत्रो पर दिल्ली से शासन करना बहुत ही कठिन है. इसी विचार के साथ उसने राजधानी परिवर्तन का विचार अपने में लाया. उसने दक्कन में पुणे के पास विद्यमान दौलताबाद को अपने राजधानी के रूप में चुना. उसने राजधानी परिवर्तन के साथ-साथ दिल्ली की समस्त जनता को भी दौलताबाद चलने का आदेश दे दिया. जिन लोगो ने दौलताबाद जाने से मना किया उन्हें जबरदस्ती ले जाया गया. राजधानी परिवर्तन के इस क्रम में अनेक बीमार और अपाहिज व्यक्ति मर गए. इसके अलावा जिन लोगो का दिल्ली से एक आत्मिक लगाव था उन्हें दिल्ली का मोह सताता रहा. राजधानी परिवर्तन के पश्चात् सुल्तान को भी इस बात का एहसास हुआ की उसके द्वारा उठाया गया कदम न केवल अदूरदर्शी था वल्कि समय के लिहाज से भी गलत था. तत्पश्चात सुल्तान ने पुनः लोगो को दिल्ली चले की अनुमति दी जिसकी वजह से रही सही कमी पूरी हो गयी और लोगो को सुल्तान के निर्णय में पागलपन के तत्व नजर आने लगे. सुल्तान के इस निर्णय ने एक अलग प्रकार की आपदा को जन्म दिया.

सांकेतिक मुद्रा

सुल्तान ने नयी मुद्रा के रूप में नयी सांकेतिक मुद्रा का चलन शुरू किया. उसने चाँदी के टंका के स्थान पर तांबे के सिक्के का चलन प्रारंभ किया. लेकिन अपने इस कार्य में भी वह पूरी तरह से असफल रहा. उसने यह महसूस किया की सिक्के जारी करने वाले लोग पूरी तरह से उसके नियंत्रण में रहने चाहिए. सुल्तान के इस निर्णय से उसके राज्य में सभी लोग तांबे का नकली सिक्का बनाना शुरू कर दिए और अंततः सिक्के का मूल्य गिरना शुरू हो गया. सिक्के के मूल्य के गिरने से सरकार और भी गरीब हो गयी.

इसके पश्चात सुल्तान ने तांबे के सिक्के को चाँदी के टंके से परिवर्तित करने की आज्ञा जारी कर दी. लेकिन समस्या उस समय उत्पन्न हो गयी जब सुल्तान के शाही खजाने से जारी किये गए सिक्के भी अधिकारियों के समक्ष आने लगे और उन्हें परिवर्तित करने की समस्या उभरने लगी.

दीवान-ए कोही 

मुहम्मद बिन तुगलक ने उन गरीब किसानो की आर्थिक व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकारी स्तर पर उधार देने की व्यवस्था की जो आपदा के कारण प्रभावित थे. इसके अलावा उसने दीवान-ए-कोही विभाग की भी स्थापना की जोकि कृषि से जुडा विभाग था.

साहित्यिक स्रोत  

जियाउद्दीन बरनी की तारीख-ए-फिरोजशाही और फतवा-ए-जहांदारी से मुहम्मद बिन तुगलक के शासन के बारे में ढेर सारी जानकारी मिलती है. इसके अलावा इब्नबतूता की रेहला से भी उसके शासन के बारे में कुछ जानकारी मिलती है. सुल्तान ने इब्नबतूता को दिल्ली का क़ाज़ी नियुक्त किया था और चीन के राजा के दरबार में दिल्ली सल्तनत के राजदूत के रूप में उसे भेजा था.

मृत्यु

1351 ईस्वी में सुल्तान की मृत्यु हो गयी. चूँकि उसका कोई पुत्र नहीं था इसलिए फ़िरोज़ शाह तुगलक उसका उत्तराधिकारी बना.

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