अब कम हो जाएंगी विमान रूटों की दूरियां, ‘गगन’ प्रणाली करेगी मदद

DoThe Best
By DoThe Best July 14, 2015 10:11

अब कम हो जाएंगी विमान रूटों की दूरियां, ‘गगन’ प्रणाली करेगी मदद

केंद्रीय नागरिक विमानन मंत्री पी. अशोक गजपति राजू ने विमानों की लैंडिंग और टेकआफ को सटीक और आसान बनाने वाली स्वदेशी ‘गगन’ प्रणाली का औपचारिक उद्घाटन किया। इसरो तथा एयरपोर्ट अथॉरिटी द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह प्रणाली जमीनी उपकरणों की मदद के बिना विमान को हवाई पट्टी पर सकुशल उतारने में मदद करती है। भविष्य में ट्रेनों, बसों, और समुद्री जहाजों के सुरक्षित संचालन के अलावा कृषि, रक्षा व सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन के क्षेत्रों में भी घटनास्थल के सटीक आकलन में भी यह प्रणाली मददगार साबित होगी।

सिर्फ अमेरिका और यूरोप के पास थी ये प्रणाली

‘गगन’ का पूरा नाम जीपीएस एडेड जियो ऑगमेंटेड नेवीगेशन है। यह विमानों को जमीन से ऊपर ले जाने या ऊपर से नीचे लाने में ऊंचाई का सटीक आकलन करने में पायलट के लिए बेहद मददगार है। इस तरह की ऊर्ध्व दिशानिर्देशन में सक्षम प्रणालियां अभी तक केवल अमेरिका के पास वास के रूप में तथा यूरोप के पास इगनोस के रूप में थीं। गगन जीपीएस सेवा का विस्तार पूरे देश में और बंगाल की खाड़ी, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिम एशिया से लेकर अफ्रीका तक करेगा। इस लॉन्च के साथ भारत उन देशों (अमेरिका, यूरोपीय संघ व जापान) के क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास इसी तरह की प्रणाली है।

अब घट जाएंगी विमान रूटों की दूरियां

केंद्रीय मंत्री राजू के मुताबिक नागरिक उड्डयन मंत्रालय राज्यों और अन्य मंत्रालयों को गगन प्रणाली का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसका इस्तेमाल केवल सैन्य और असैन्य एविएशन तक सीमित नहीं है बल्कि रोड ट्रांसपोर्ट और कृषि समेत अन्य क्षेत्रों में भी होगा। गगन को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) ने संयुक्त रूप से 774 करोड़ रुपए की लागत से विकसित किया है। यह एविएशन सेक्टर को बेरोकटोक नेविगेशन उपलब्ध कराएगा। सिविल एविएशन सेक्रेटरी आर एन चौबे ने कहा कि गगन आने के बाद देश के 50 चालू हवाईअड्डों को तत्काल लाभ होगा। वहीं सभी दक्षेस देश इस प्रणाली का इस्तेमाल कर सकते हैं।

एयर ट्रैफिक कंट्रोलरों पर कम होगा दबाव

केंद्रीय मंत्री राजू ने कहा कि गगन की वजह से विमानों से लगातार संपर्क बनाए रखने के लिए टावर सिस्टम के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। चूंकि विमान से संबंधित सारी जानकारी उपग्रह के जरिए उपलब्ध होगी, उससे न सिर्फ विमान पायलट बल्कि एयर ट्रैफिक कंट्रोलरों पर भी काम का दबाव कम होगा। साधारण भाषा में कहा जा सकता है कि पहले विमानों के साथ एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावरों की मदद से संपर्क में रहते थे लेकिन अब इस नए सिस्टम से उपग्रह के जरिए विमानों के बारे में सटीक जानकारी मिलती रहेगी। यह भी पता चलेगा कि विमान की गति और देशांतर क्या है और वह कितनी ऊंचाई पर है।

2013 में ही वैश्विक रूप से मिल गई थी मान्यता

विमान संचालन के लिए गगन को 30 सितंबर 2013 को ही वैश्विक रूप से मान्यता मिल गई थी। परंतु इसरो के जीसैट-8 तथा जीसैट-10 उपग्रहों से इसके सिग्नल 14 फरवरी, 2014 से मिलने प्रारंभ हुए थे। इन संकेतों को जब जीपीएस से प्राप्त संकेतों के साथ मिलाकर उपयोग में लाया जाता है तो विमान का संचालन ज्यादा आसान और सटीक हो जाता है। इसके उपयोग से अब उड़ानों के सीधे रूट चुनना संभव हो गया है। इससे दूरियां घटने के साथ ईंधन की कम खपत होने से प्रदूषण में भी कमी आने लगी है। इससे इससे हवाई सुरक्षा में भी सुधार हो रहा है।

रेल, सड़क व जल यातायात के लिए भी उपयोगी

विमानन मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक गगन का उपयोग रेल, सड़क व जल यातायात में भी किया जा सकता है। इसके लिए ट्रेनों, बसों या जलपोतों में इसके रिसीवर लगाने होंगे। इसके बाद इन सभी प्रकार के वाहनों का सुरक्षित संचालन संभव होगा और टक्कर की संभावनाएं खत्म हो जाएंगी। ट्रेनों के मामले में यह प्रणाली एंटी कोलीजन डिवाइस (एसीडी) या ट्रेन प्रोटेक्शन एंड वार्निंग सिस्टम (टीपीडब्ल्यूएस) अथवा टीकैस (ट्रेन कोलीजन अवाइडेंस सिस्टम) में उपयोग में आ सकती है। अभी जीपीएस पर निर्भरता के कारण कई जगहों पर ये प्रणालियां सटीक ढंग से काम नहीं करती हैं। गगन में इन दोषों को दूर करने की काबिलियत है।

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